Jan 31, 2008

सरनेम(उपनाम) की उत्पत्ति और विकास का सिद्धांत

जब देखता हूँ कि आज हर जगह सरनेम का लफडा है, तो कभी कभी सोचता हूँ कि सरनेम की शुरुआत कैसे हुई होगी। ज्यादा दूर न जाके भारत मे सरनेम की उत्पत्ति पर विचार करते हैं।( अब कोई ये न समझे कि भारत सॉफ्ट टार्गेट है, या भारतीय सहिष्णु होते हैं इसलिए मैं भारत की बात कर रहा हूँ।मैं भारत की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मैं भारत के बाहर कभी गया ही नहीं। और ये बताएं कि सरनेम की उत्पत्ति पर विचार करने के लिए भारत से अच्छा अध्ययन स्थान कोई और हो सकता है। ऐसी "सर्नेमिक विविधता" वाला देश हमे कहाँ मिलेगा बताइए। इसलिए मेरी बात को अन्यथा न लें, और अगर ले रहे हों तो भाड़ मे जाएँ। )

चलिए कोष्टक मे जो भी लिखा है वो सारी कूटनीतिक बात को पीछे छोड़ कर आते हैं मुद्दे पर, और बात करते हैं सरनेम की। मैंने कुछ कथित रुप से विद्वान टाईप बुजुर्गों से इस बारे मे कभी पूछा था। सबने अलग अलग बात बताई। उनकी बकवास का और मेरे विचार मंथन का जो भी लब्बो-लुआब निकल कर आया वो कुछ इस तरह का था :-

पाषाणकाल मे सरनेम का कोई महत्व नहीं रहा होगा। क्योंकि उस काल मे सारे काम लोग मिलजुल कर करते थे।कबीले के नौजवान शिकार करते थे,औरतें कपडे सिलने, खाना पकाने के अलावा कढाई बुनाई की क्लास ज्वाइन करती रही होंगी, और बुजुर्ग प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते हुए टिक्के और कबाब का आनंद लेते रहे होंगे या आपस मे मिलकर गपशप किया करते होंगे।हर कोई मांसाहारी था, हर कोई चमार था हर कोई बन्सोड था, इसलिए छुआछुत वाली कोई बात ही नहीं रही होगी।उस समय अगर सरनेम रहे भी होंगे तो शायद ऐसे रहे होंगे-


बीमारी का बहाना बनाकर शिकार पर ना जाने वाले- कामचोर
शिकार पर जाने के लिए हमेशा तैयार- मेहनती
कोई शिकार करके लाये फिर भी न खा पायें- अलाल
शिकार कोई और लाये और ये खा जाएं- शिकारचोर या हरामखोर
पत्ते पहनने वाले- पत्राम्बर
चमड़ा पहनने वाले-चम्राम्बर
पत्ते से पोंछने वाले-पत्रपोंछे
पानी से धोने वाले- पणधुले
सूअर का शिकार करने वाला-सूअरमारे
हाथी का शिकार करने वाला- हाथिमार

कहने का मतलब यह है कि जो जैसा काम करता रहा उसे वैसा ही उपनाम मिलता रहा। अब धीरे धीरे ये उपनाम या सरनेम वंशानुगत होते गए होंगे. इनके वंशानुगत होने में भी मनुष्य के स्वभाव ने ही अहम् भूमिका निभाई होगी.उदाहरण के तौर पर जैसे कबीले के सरदार ने किसी एक हाथी के शिकारी युवक को एक भेड़,पत्थर का भाला और हाथीमार की उपाधि ईनाम में दी होगी,वो अचानक ही "कबाईलीयन ऑफ़ दी ईयर" बन गया होगा और कबीले की सुंदरियों की निगाह में चढ़ गया होगा.ये सब देखकर उसके साथी जल मरे होंगे. रात में मदिरापान के समय किसी जब उसने गर्व से वो भाला अपने साथियों को दिखाया होगा तो किसी ने जलनखोरी में चिढ़कर उसे कह दिया होगा कि "चल बे, ये भाला हमें न दिखा, हमें तेरे पूरे खानदान का पता है, तेरा परदादा मुर्गिमार था,तेरा दादा सूअरमार था,तेरा बाप भी सूअरमार था. तू चाहे कितने भी हाथी मार ले, रहेगा तो तू सूअर मार की औलाद ही ना।" बस ऎसी ही कुछ घटनाओं से सरनेम वंशानुगत हो गए होंगे,कुछ जलनखोरों ने मिलकर पूरा इतिहास बदल दिया होगा।

अब हरित क्रांति का दौर आया,रोजगार बढ़ गए और साथ ही कामों की विविधता भी बढ़ गयी।कोई बेरोजगार न रह गया। कबीले अब गाँव बन गए होंगे। अब गाँव का नाम भी लोगों की पहचान बन गया होगा. नाम,बाप का नाम के साथ एक और सवाल जुड़ गया होगा गाँव का नाम. लोग हर अनजाने से पूछते होंगे "कौन हो भाई,कौन गाँव से आये हो?"अब हर कोई तो इतना सहनशील नहीं होता कि बार बार नाम बताये फिर गाँव का नाम बताये. तो कुछ लोगों का दिमाग खराब हुआ और उन लोगों ने अपने गाँव के नाम अपने सरनेम बना लिए. साहिर लुधियानवी और हसरत जयपुरी उन्हीं में से रहे होंगे. अब नाम पते की चिकल्लस ख़त्म हो गयी।

हरित क्रांति के बाद गाँवों का आर्थिक विकास हुआ,जो काम धंधा करते रहे वो कभी गाँव के तो कभी काम के नाम से पहचाने जाते रहे होंगे।समाज दो वर्गों में बाँट गया होगा; मेहनत करके खाने कमाने वाले और बैठ कर रोटियाँ तोड़ने वाले. खाने को बहुत था इसलिए एक वर्ग मेहनत करना ही नहीं चाहता था.अब एक बड़ी दुविधा उत्पन्न हो गयी थी. मेहनत करने वाले तो अपने काम के नाम से पहचाने जाते थे पर निठल्लों का क्या उपनाम हो? ये एक बड़ी परेशानी का सबब बन गया. पंचायत बैठी, किसी ने सुझाया कि इन निठल्लों को इनके बाप का नाम दो. पर किसी ने आपत्ति जताते हुए कहा कि उनका क्या जिनके पिता ने उन्हें निठल्लेपन के कारण अपनी संतान मानने से इनकार कर दिया है?बड़ी समस्या थी. सरपंच ने फैसला सुनाया कि या तो ये निठल्ले कोई काम अपना लें या फिर गाँव छोड़कर चले जाएं।
निठल्लों को दूसरा रास्ता अच्छा लगा. वे गाँव से निकल कर जंगलों में चले गए और शिकार करना तो आता नहीं था इसलिए कंदमूल खाकर अपना जीवयापन करने लगे। कोई दोहा गढ़ता तो कोई चौपाईयाँ सुनाता।उनका एक ही मंत्र था
"अजगर करे न चाकरी,पंछी करे न काम
जंगल में कंदमूल भरा पड़ा है,खाओ सुबह शाम"

कुछ निठल्लों सोचना शुरू किया क्योंकि उनके पास समय बहुत था।कुछ ने जमीन पर लकीरें खींचना शुरू किया,इन निठल्लों ने भाषा,गणित और पता नहीं क्या क्या फालतू चीजों की खोज की. अपनी सोच को इन्होने पत्तों में लिखना शुरू किया,और अपने बच्चों को सिखाने लगे। निठल्लों ने खाली समय में हस्तलिखित पत्तों के भण्डार जमा कर लिए जिन्हें वो पोथी कहने लगे। निठल्लों के सरनेम अब पोथी निर्दिष्ट हो गए थे।

उदाहरण- एक पोथी रटने वाला-पोथी
दो पोथी रटने वाला-द्विपोथी
तीन पोथी रटने वाला-त्रिपोथी
चार पोथी रटने वाला-चतुर्पोथी
जो पोथी न रट पाए, वे अपने बाप का नाम उपनाम की जगह लगाते गए होंगे।


खैर, बाहर की दुनिया बदल रही थी,गाँव अब शहर बन चुके होंगे और सामंतवाद चरम पर पहुँच गया होगा. पंचायती राज ख़त्म हो गया था और प्रशासन केंद्रीकृत होकर एक व्यक्ति के हाथ में चला गया था जिसे राजा कहते थे। लोगों के पास अफरात माल जमा हो गया था पर दिन भर मेहनत करते रहने के कारण मन की शांति नहीं रही होगी. चारों तरफ अशांति का बोलबाला हो गया. राज दरबार में भी अशांति थी, क्योंकि ऊटपटांग खाते रहने के कारण रानियों को अपच की बीमारी हो गयी थी. राजमहल भी महामारियों का जन्मस्थान बन गया होगा।
इधर निठल्लों का भी भोजन समाप्ति की कगार पर होगा, क्योंकि उनकी जनसंख्या काफी बढ़ चुकी थी।ऐसे में किसी निठल्ले ने सुझाया कि चलो अब जंगल से बाहर चलते हैं भिक्षा मांग कर अपना जीवन यापन करेंगे. निठल्ले ना सिर्फ बाहर निकले बल्कि उन्होने राजदरबारों में अपनी धाक भी जमा ली. पर ये सब हुआ कैसे होगा? शायद ये कुछ इस तरह हुआ होगा:



निठल्ले बाहर आये तो उन्होने देखा की चारों ओर अफरातफरी का माहौल है। ये देख कर निठल्लों के कलेजे में ठंड पड़ गयी होगी,कुछ दौड़ते सैनिको को देखकर एक निठल्ले ने पूछा कि "भाई क्या हुआ? कहाँ भागे जा रहे हो?"बदहवास सैनिक ने कहा कि महाराजाधिराज की पटरानी को जबरदस्त लूज़मोशन हो रहे हैं, हम ऐसे व्यक्ति को ढूँढ रहे हैं जो उन्हें इससे निजात दिला सके. उस व्यक्ति को राजमहल का विशेष अतिथि बनाकर ताउम्र रखा जायेगा।" अंधे के हाथ जैसे लग गयी बटेर,निठल्लों को जंगल में रहते रहते औषधियों का थोडा बहुत ज्ञान तो हो ही गया था, उन्होने फौरन जाकर रानी को वो औषधि दी होगी और रानी के ठीक होते ही उनकी महल में धाक जम गयी होगी। कुछ समय बाद तो वे राजा के आधिकारिक "साले" की तरह व्यवहार करने लगे होंगे. कुछ समय बाद राजा राजकाज में भी उनकी सलाह लेने लगा होगा। अब तो निठल्लों की हो गयी ऐश. सैय्याँ भये कोतवाल अब डर काहे का।

निठल्ले जानते थे कि यदि उन्होने अपना ज्ञान बांटा तो उनकी पूछ ख़त्म हो जायेगी,और वे मेहनतियों के द्वारा की गयी बेइज्जती और गाँवनिकाला के बाद की पीडा को भूले नहीं थे। इसलिए उन्होने ठान लिया कि उनका ज्ञान किसी को नहीं मिलेगा।
अब समाज चार वर्गों में बाँट गया था:
सबसे ऊपर का वर्ग था निठल्लों का
फिर निठल्लों के रक्षक जिसमे राजा और सैनिक शामिल थे.
फिर निठल्लों के अधीन व्यापारी,सप्लायर्स।
और अन्तिम वर्ग था मेहनतियों का।

तब से लेकर आजतक सरनेम ज्यों के त्यों हैं। पर सरनेम अब वंशानुगत रह गए हों ये पूरी तरह से सच भी नहीं है। सरनेम की वंशावली को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं:

(१) डर - डर सबको लगता है,फूलनदेवी के डर से चम्बल के कितने ठाकुरों ने सरनेम बदल लिए। ठाकुरों के डर से कितनी फूलनदेवीयों ने अपने सरनेम बदल लिए.

(२) दंगे फसाद - दंगे फसादों में अच्छे अच्छों के सरनेम बदल जाते हैं,दंगे फसादों में सरनेम बदलकर लोग आपसी प्रेम का प्रदर्शन करते हैं।

(3) क्रांतियाँ - जब समुद्र की तलहटी में ज्वालामुखी फटता है, तो समुद्र तल के पानी का भी रंग बदल जाता है।

(४)स्वार्थ - कई लोग स्वार्थ में सरनेम बदल लेते हैं।उदाहरण के तौर पर- नौकरी लगने तक गोंड थे,नौकरी लगने के बाद गौड़ हुए और राजनीति में आने मिला तो गौर हो गए.कुछ लोग फर्जी जाती प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सरनेम बदल लेते हैं।

(५)आत्मविश्वास की कमी - इस कारण से सरनेम बदलने के तो लाखों उदाहरण मिलते हैं, लोग तो अपने सहकर्मी, सहपाठियों से भी असली सरनेम छुपा जाते हैं।

(६)लालच - कई बार जब दूसरे व्यक्ति से काम निकलवाना होता है, तब हम उसका सरनेम परिवर्तित करके उसे बराबरी का एहसास दिलाते हैं।उदाहरण - मध्यप्रदेश में जूते सिलवाते वक़्त चर्मकार को "चौधरी जी" कहकर संबोधित किया जाता है. खेतिहर मजदूर आदिवासियों को खेत में काम करवाते वक़्त "ठाकुर साहब" कहने का भी प्रचलन यहाँ पर है. ये अलग बात है कि जब पैसा देने की बारी आती है, तो "ठाकुर साहब" और "चौधरी जी" को उनके असली उपनामों से पुकारकर उनकी असली औकात भी याद दिला दी जाती है।( ये मध्यप्रदेश का ट्रेड सीक्रेट है)

सरनेम में पदोन्नति या सर्नेम्मोनती जैसा कोई प्रावधान नहीं है। "सरनेम सुधार आन्दोलन" जैसा कोई आन्दोलन भी अभी तक अस्तित्व नहीं ले सका है, ये शायद इसलिए, क्योंकि एक का "सरनेम सुधार आन्दोलन" दूसरे को "सरनेम बिगाड़ आन्दोलन" प्रतीत हो सकता है।हालांकि बीच में कुछ हड़ताली डॉक्टरों ने सुझाव दिया था कि सबका सरनेम एक कर दिया जाए। आजकल के डॉक्टरों से ऐसे ही बेवकूफाना सुझावों की उम्मीद रहती है। अरे,,, "सबका मालिक एक" नहीं हो पाया अब तक, सबका सरनेम कहाँ से एक हो जायेगा।

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