Feb 2, 2008

राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट ।

भारतीय राजनीति में महात्मा गाँधी के बाद अगर सबसे ज्यादा कोई नाम बिका है तो वो है "राम". राम नाम पतंग है। हर राजनीतिक दल की पतंग अलग है। हर राजनीतिक दल अलग तरीके से पेंच लडाता है।

बीजेपी इस पतंगबाजी का सबसे पुराना खिलाडी है, गुजरे वक़्त में उसने माँझे की धार और तेज कर ली है। राम नाम का उपयोग कमाने और डराने में कैसे किया जाता है, ये बीजेपी से ज्यादा बेहतर और कोई राजनीतिक दल नहीं जानता।बाबरी मस्जिद को ढहाए १६ साल हो गए,पर अभी तक राममंदिर नहीं बना।हालांकि बीजेपी नेताओं के घर लक्ष्मी की खासी कृपा हो गयी,बच्चे विदेश पढ़ने चले गए, पूरे देश ने देखा कि बीजेपी को कितना चन्दा मिलता है, पार्टी मीटिंग पांच सितारा होटलों में होने लगी,फीलगुड के विज्ञापन पर अरबों खर्च दिए पर राम मंदिर बनाने को पैसे नहीं जुडे। वैसे गुजरात चुनाव के बाद बीजेपी ने पुराने मुद्दों को भूलकर अपनी एक नयी छवि पेश करने का प्रयास किया है। रामजन्मभूमि को त्यागकर रामसेतु पर ध्यान केन्द्रित किया है।राम मुद्दा भी है, और समाधान भी।बार बार वोट मांगने के लिए मुद्दे का रहना आवश्यक है। राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए अयोध्या का चूल्हा और सेतुसमुद्रम का तवा बहुत जरूरी है।

अब तो बहन जी पीछे नहीं रह गयी हैं। सुना है अमीनाबाद में बहन जी के कार्यकर्ता "सच्ची रामायण" बंटवा रही हैं। मायावती का पेरियार प्रेम देखकर कांग्रेस और बीजेपी अब एक ही मंच पर आ गए हैं, और उन्होने खुलकर मायावती के कृत्य का विरोध करना प्रारंभ कर दिया है। करात को डर लग रहा होगा कि कहीं कांग्रेस और बीजेपी साथ मिलकर तीसरे मोर्चे कि हवा न निकाल दें।बहन जी का विरोध करके कांग्रेस तो एफिडेविट केस से उबरने का प्रयास कर रही है, और बीजेपी इसे सीडी केस के तोड़ की तरह देखने का प्रयास कर रही है। बहन जी गलती भी तो करती हैं, नागनाथ सांपनाथ को एकसाथ ललकारेंगी तो यही तो होगा ना। किसी न किसी का विष तो काम कर ही जाएगा। वैसे अमीनाबाद में "सच्ची रामायण" बांटे जाने से बहन जी की सामाजिक अभियांत्रिकी की असलियत दिख रही है।इससे कहीं उनके प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब में पलीता न लग जाये।

कभी सुना था कि रामराज्य में शेर और बकरी एक ही घाट का पानी पीते थे। इसमे नयी बात कौन सी है,अभी भी पीते हैं,एक ही घाट से पीते हैं पर अलग अलग समय पर।कल कोई कह रहा था कि देशमुख सरकार में रामराज्य है। मैंने पूछा क्यों?तो जवाब मिला कि वहाँ शिवसेना वाले और यूपी,बिहार के लोग एक ही नलके का पानी वापरते हैं. तो आजकल रामराज्य का मतलब ये हो गया है।लोग थोडे में ही खुश रहें यही आज का रामराज्य है।मुम्बई में आयोजित यूपी महोत्सव में भोजपुरी नायिकाओं के ठुमके लगाने से यूपी,बिहार वालों के मन का भय समाप्त हो जाएगा,ऐसा शिवसेना वालों का मानना है। ये शिवसेना की रामराज्य की परिभाषा है।


ये सारी परिभाषाएं महात्मा गाँधी द्वारा कल्पित रामराज्य से कितनी भिन्न हैं।क्या इसमे कहीं भी सबको रोटी,सबको कपडा,सबको मकान वाली सोच है?नहीं है ना। इसमे "सबको" की जगह "हमको" वाला भाव प्रबल है।जनता की प्राथमिक आवश्यकताएं आप मंदिर मस्जिद बनाकर पूरी नहीं कर सकते।

"पेट की भूख को घुटनों से दबा कर बैठा हूँ
ये ना समझो कि सजदे में हूँ।"


राजनीतिक दलों ने सालों तक गांधी और राम को बेचने का काम किया,पर समझने की कोशिश कभी नहीं की।

लिखते लिखते काफी सीरियस बातें लिख गया,ऐसा अक्सर होता नहीं है।मन और माहौल हल्का करने के लिए अब एक चुटकुला सुनाता हूँ:
बचपन के दिन याद आते हैं, जब बाबरी विध्वंस हुआ था तो उसके बाद कारसेवक ट्रेनों में भर भर के मुफ्त यात्राओं का मजा उड़ा रहे थे।हम लोग ट्रेन से नाना नानी के घर जा रहे थे। इलाहाबाद इटारसी पैसेंजर में पिताजी ने एक कारसेवक से पूछ लिया कि ये तुम लोग थैले में क्या ईंटे भरके ला रहे हो ,उसने कहा कि ये ऐसी वैसी ईंटें नहीं,बाबरी मस्जिद की ईंटें हैं।पिताजी ने कौतुहूलवश उससे ईंटें देखने के लिए मांगी,उसके बाद वे जोर से हँसे और खूब देर तक हँसते रहे। वो लाल मिटटी की बनी एकदम ताज़ी ईंटें थीं, उन ईंटों पर अंग्रेजी में "BABRI" लिखा हुआ था, और कटनी स्टेशन पर किसी सिन्धी ने उन कारसेवकों को वो ईंटें २००-२०० रुपये में बेच दी थीं।

3 comments:

Rahul said...

घटिया मानसिकता बालो के द्वारा लिखा गया घटिया लेख है इसमें लेखक का गलती नही लेखक को दिया गया संस्कार ही गंदा है। तुम्हारे शायद खुन ही गंदा है या फिर कीसी का मिक्स है चेक करबा लेना।

गुगल बालों ने गलती की है ब्लाग बना कर हर एरु-गैरु अपने आपको लेखक समझता है फोकट में ब्लाग मील जाता है तो कुछ भी लिख देता है। गुगल अगर पैसा लेने लगे तो तुम्हारे जैसे लेखक रोड पर खरे दिखेगें, बच्चे भीख मागते हुये और बीबी पता नही कहा जयेगी।

लिखना है तो अच्छी बाते लिखा करो जिससे देश और समाज का भला हो। नेता मत बन।

शिशिर उइके said...

धन्यवाद भाई, चोट गहरी लगे तो कराह और जोर से आती है.आपकी तिलमिलाहट से मेरा मकसद पूरा हुआ.परिचय गुप्त रखकर कुछ भी बोलना आसान है, सामने आकर बात करने का साहस विरलों में होता है.आपके शब्दों से आपके अच्छे संस्कारों और मानसिकता का परिचय मिलता है.

अभय तिवारी said...

बहुत खूब भाई.. धार है बात में..