<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152</id><updated>2012-02-16T01:56:12.921-08:00</updated><category term='कविता'/><category term='मोदी'/><category term='उपवास'/><category term='व्यंग्य'/><category term='भेड़िया'/><category term='फिल्म समीक्षा'/><category term='तुकबंदी'/><title type='text'>वनमानुष Vanmanush</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>28</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-8801385592570905821</id><published>2011-09-21T11:49:00.000-07:00</published><updated>2011-09-21T12:18:07.894-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भेड़िया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मोदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपवास'/><title type='text'>भेड़िये का उपवास !</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-1ljqw9LLB9M/Tno3PjoXZsI/AAAAAAAAAK0/DeXYhYrB8bs/s1600/modi.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 247px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-1ljqw9LLB9M/Tno3PjoXZsI/AAAAAAAAAK0/DeXYhYrB8bs/s320/modi.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5654893022519191234" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आममुग्धता के गानों से&lt;br /&gt;भाट-चारणों की तानो से&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;अंधेर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;नगरी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सूरत&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बदलती।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;चढ़ा&lt;/span&gt; लो अहं की इमारतें&lt;br /&gt;बिछा दो नफरत की सड़कें&lt;br /&gt;और लगा लो मेले&lt;br /&gt;मासूमो की कब्रों पर&lt;br /&gt;फिर दे दो  'बेशर्म विनाश' को&lt;br /&gt;'विकास' का नाम&lt;br /&gt;पर इतना लो जान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वाईब्रेंट' का बोर्ड लगाने भर से&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मरघट&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;हकीकत&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बदलती।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भेड़िया चंद रोज़ कर सकता है&lt;br /&gt;शिकार से नागा, पर उसकी&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;खूँरेजी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;फितरत&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बदलती।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-8801385592570905821?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/8801385592570905821/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=8801385592570905821' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/8801385592570905821'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/8801385592570905821'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2011/09/blog-post_21.html' title='भेड़िये का उपवास !'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-1ljqw9LLB9M/Tno3PjoXZsI/AAAAAAAAAK0/DeXYhYrB8bs/s72-c/modi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-3592076791020048712</id><published>2011-09-01T08:09:00.000-07:00</published><updated>2011-09-01T08:56:58.028-07:00</updated><title type='text'>अब तो ये स्पष्ट है, जो इनके साथ में है वो दुष्ट हैं (पार्ट १)</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-7mlmwMCIET4/Tl-iFXQlZwI/AAAAAAAAAKk/XQMUZvuUHpY/s1600/Anna_Team_Insis10087.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 320px; height: 219px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-7mlmwMCIET4/Tl-iFXQlZwI/AAAAAAAAAKk/XQMUZvuUHpY/s320/Anna_Team_Insis10087.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5647410670772512514" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रामलीला मैदान में १२ दिन की नौटंकी आखिरकार ख़त्म हुई। 'नेता विरोधी'  आन्दोलन अंततः समाप्त हुआ और दरुए-बेवडे और फुरसतिये वापस अपने अपने घरों  को लौट गए। ऐसा नहीं है कि इस आन्दोलन में सिर्फ यही लोग शामिल  थे।बल्कि इस आन्दोलन को कुछ ऐसे पढ़े लिखे लोगों का समर्थन मिला जो सरकारी  सेवा से या तो रिटायर हो गए हैं,निलंबित हो गए हैं अथवा अपने मन की न होने  के कारण इस्तीफ़ा दे चुके हैं अर्थात इस मेले के बहाने चूहे खाकर ये  भूतपूर्व सरकारी बिल्लियाँ हज हो आयीं। इस आन्दोलन को मीडिया ने अभूतपूर्व  कवरेज दिया और इस दौरान मानो उन्होंने कसम खा ली कि 'नेता' इस देश के लिए  प्राकृतिक आपदा,विदेशी घुसपैठ से बड़ा खतरा हैं। मीडिया में शोर है कि  हमारी संसद चोर है। बहुत बढ़िया! राडिया काण्ड में फंसे अपने बड़े बड़े  जोधाओं के जुर्म छुपाने वाली मीडिया के 'नेता विरोध' के कारणों की समीक्षा  आवश्यक है।     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रचार और प्रायोजित कार्यक्रम की हद ये है कि खुद को गांधीवादी दिखाने के  लिए बैकग्राउंड से भारत माता को हटाकर पहली पृष्ठभूमि में कोने में पड़े  ‘गाँधी’ को इनलार्ज करके नयी पृष्ठभूमि में लगाया जाता है और फिर  दलित-मुस्लिम प्रेम दिखाने के लिए दोनों समुदाय की बच्चियों से अनशन  तुडवाने की नौटंकी होती है।जिसे हमारे समाचार चैनल सदी का महानतम काम मान  कर बार बार दिखाते हैं।“दलित लड़की के हाथों अनशन तोडा”।क्या कहने! दलित और मुस्लिम वर्ग को अपने साथ दिखाने के लिए जिस तरह का नंगापन किया  गया वो ऐतिहासिक रूप से निंदनीय है. दलित बच्ची को ढूंढकर उसके हाथों से  हजारे की हड़ताल तुडवाई गयी और इस बात को बेशर्म तरीके से प्रचारित किया  गया।   इन समुदायों से बच्चे जुटाने से पहले उनकी जात और धर्म तो ज़रूर पूछा गया  होगा। इससे भी अधिक शर्मनाक थी गंडे-तावीज बेचने वाले चैनलों की टीआरपी की  हवस जिन्होंने न्यूज़ फ्लैश और टिकर में बार बार ये दिखाया कि “फलां बच्ची  दलित है” “एक दलित बच्ची के हाथों टूटेगा अनशन” “अन्ना की महान इच्छा”। कैसा शर्मनाक अक्षम्य कृत्य था ये और इस पर देश के बुद्धिजीवी आँखें मूंदे  रहे। ये पूरा ड्रामा देखकर तो यही लगता है कि  इस देश की आँखों में निम्न  तबकों के लिए कोई इज्जत नहीं है। &lt;br /&gt;अद्भुत!! अद्वितीय!! अक्षम्य!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१२ दिन की नौटंकी के बाद आखिर हुआ क्या? विक्टरी!!&lt;br /&gt;अरे  कैसी विक्टरी भैया? अरे तुम तो कहते थे कि जब तक मेरे मन का बिल पास नहीं  होगा तब तक मैं उपवास नहीं तोडूंगा. क्या हुआ उस बड़ी बड़ी हुंकार का,ठुस्स  हो गए न बारह दिन की भूख में? सिर्फ ३ मांगों पर प्रस्ताव पारित हुआ है  मूर्ख शिरोमणि।  सरकार ने तुम्हारे मुंह में लौलीपौप और हाथ में झुनझुना  पकड़ा दिया है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब होगा क्या? वही जो १२ दिन पहले हो जाना था. ४  ड्राफ्ट जायेंगे स्टैंडिंग कमिटी के पास.यही तो सरकार कह रही है पिछले १  महीने से. जिस काम के लिए इस मूर्खों की फ़ौज ने धमकियां दी और संसदीय  प्रक्रिया पर कीचड उछाली.वही काम अरुणा रॉय,हर्षमंदर जैसे विद्वानों और  समाज सेवियों ने चुपचाप संवेधानिक तरीके से कर दिया.टी.एन.शेषन का ड्राफ्ट  भी गया है स्टैंडिंग कमिटी के सम्मुख.अब वो ही फैसला लेगी कि कौन से  प्रोविज़ंस सही हैं और कौन से नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या हुआ विक्टरी का? आखिर उन्हीं नेताओं के पास घुटने टेककर गए न जिनके साथ अछूतों सा व्यवहार कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस  तरह की ओछी भाषा का प्रयोग इन कुछ दिनों में हजारे के मंच से हुआ, वह इस  टीम की मानसिकता कहने के लिए पर्याप्त है। नेताओं को अनपढ़ कहने वाले किरण  बेदी और ओम्मपुरी ऐसा कहते समय अन्ना हजारे की क्वालिफिकेशन भूल गए। इसलिए  अग्निवेश ने अगर अन्ना और उसकी टीम को पागल हाथियों का झुण्ड कहा है तो कुछ  गलत बात नहीं की। केजरीवाल और कौंग्रेस नेताओं की गुप्त बातचीत और डील का रिकॉर्ड भी  जनता के सामने लाना चाहिए ताकि अन्ना हजारे के पूरी नौटंकी की असलियत इस  देश के सामने आये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इस हुडदंगी उन्माद की पृष्ठभूमि रचने और उसके क्रियान्वयन में आरएसएस का जो योगदान है उसके विषय में तो बस इतना कहूँगा-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीडतंत्र की आड़ में सबके हो गए वारे न्यारे&lt;br /&gt;गाँधी टोपी पहनकर झूम रहे हैं गांधी के हत्यारे &lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-3592076791020048712?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/3592076791020048712/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=3592076791020048712' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/3592076791020048712'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/3592076791020048712'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='अब तो ये स्पष्ट है, जो इनके साथ में है वो दुष्ट हैं (पार्ट १)'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-7mlmwMCIET4/Tl-iFXQlZwI/AAAAAAAAAKk/XQMUZvuUHpY/s72-c/Anna_Team_Insis10087.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-2062766425646324205</id><published>2011-06-30T11:22:00.000-07:00</published><updated>2011-06-30T11:40:02.518-07:00</updated><title type='text'>चवन्नी : मेरे बचपन का पूँजीवाद</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-j5rUo3lciCQ/Tgy_kbxlkqI/AAAAAAAAAIw/M2qJIVHm2FI/s1600/25%2Bpaise.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 300px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-j5rUo3lciCQ/Tgy_kbxlkqI/AAAAAAAAAIw/M2qJIVHm2FI/s320/25%2Bpaise.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5624080667330843298" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="fbPhotoCaptionText"&gt;दोस्तों आज चवन्नी हम से विदा हो गयी।   तुम लोग सोचोगे कि ये क्या 'मुंह्बाजी' है पर सच में पता नहीं क्यों मुझे  इसके जाने का बहुत दुःख हुआ।&lt;br /&gt;समय बदलता रहता है, हमारे बड़ों ने शायद  'आने'(वही एक आना,दो आना) को इस तरह याद किया होगा और शायद आज से  बीस-पच्चीस साल बाद आने वाली पीढ़ी में से कोई 'हजार के नोट' की समाप्ति पर  कुछ दुःख व्यक्त करे। पर मेरे बचपन की औकात तो चवन्नी तक ही सीमित थी,इसलिए  मैं इसके सम्मान में कुछ शब्द कहूँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे पंजी,दस्सी और बीस पैसे  के जाने का कभी उतना दुःख नहीं हुआ जितना इस छोटी सी गोल चवन्नी के  विलुप्त होने का, क्योंकि बचपन में ये मेरे छोटी छोटी हथेलियों में आसानी  से आ जाती थी और इसे नन्ही सी मुट्ठी में दबा के 'कुल्फी,फुलकी वाले भैयाओं'  या 'गटागट-बोरकुट-आमकुट बेचने वाली अम्माओं' के पास जल्दी से भाग के पहुंचा  जा सकता था। बाकी पैसे हाथ में गड़ते थे पर चवन्नी तो जैसे हम बच्चों के  लिए ही बनी थी। गुल्लक के फूटने के बाद बड़े-छोटे,आड़े-टेढ़े सिक्कों के बीच  पड़ी हुई चवन्नियां कितनी क्यूट लगा करती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेलने के लिए कंचे,  खाने के लिए संतरे,नारियल या मिंट की गोलियां,आइस कैन्डी-आइस गोला और  चॉकलेट (तब किसमी टॉफी या मेलोडी को ही चॉकलेट बोलकर खाते थे), पढ़ाई के लिए  पेंसिल-रबर-कटर सब आता था चवन्नी में। वो भी क्या दिन थे जब जेबखर्च के  रूप में हमें चवन्नी मिलती थी और उस चवन्नी से मानो हम दुनिया खरीद लिया  करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचा न था कि चवन्नी के जाने से गायब हो जायेंगे चवन्नी  छाप,चवन्नी चोर जैसे शब्द, और कंजूसों के लिए फिर नए शब्द गढ़ने की  जिम्मेदारी समाज पर होगी. साथ ही ये भी सोचने वाली बात है कि  चवन्नी,दस्सी,पंजी जैसे नाम समाज द्वारा प्यार से दिए गए थे,बड़े सिक्कों  को क्या कभी हम इतने लाड़ से बुला पाएंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोडा दुःख तो इस बात का  भी है कि धीरे-धीरे बाजार से अठन्नी और एक रुपये का सिक्का भी गायब हो  जायेंगे जिन्होंने किराए में ही सही हमारा परिचय 'हमारे साहित्य' से कराया था, चाचा  चौधरी,बिल्लू,पिंकी जैसे चरित्रों को हमारे सपनों में जगह दी थी और यही वो  सिक्के हैं जो दरअसल हमें टेक्नोलॉजी के द्वार तक ले गए थे तथा हमें  'मारियो' और 'कोंट्रा' के दर्शन कराए थे।  मेरा मानना है कि आजकल के  बच्चों के सामने हमारी कोई तुलना नहीं और उनकी बढती मांगों पर हमें कोई  नाराजगी नहीं होनी चाहिए।  पर अच्छा लगता है ये सोचकर कि हम अभावों में खुश  रहने वाली पीढ़ी से थे और गर्व होता है कि इसी खूबी के कारण हमारी पीढ़ी के  बच्चे 'चिल्लर पार्टी' नाम से जाने गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="fbPhotoCaptionText"&gt;खैर, इस चेंज (चिल्लर) की  जरूरत शायद अब हमारी चेंजिंग इकोनोमी को नहीं है। &lt;/span&gt;&lt;span class="fbPhotoCaptionText"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; इसलिए चवन्नी को हमारे बचपन की इतनी यादों का हिस्सा बनने के लिए सादर-सप्रेम धन्यवाद और भरे मन से अलविदा।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-2062766425646324205?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/2062766425646324205/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=2062766425646324205' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/2062766425646324205'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/2062766425646324205'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2011/06/blog-post_30.html' title='चवन्नी : मेरे बचपन का पूँजीवाद'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-j5rUo3lciCQ/Tgy_kbxlkqI/AAAAAAAAAIw/M2qJIVHm2FI/s72-c/25%2Bpaise.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-5321055391253495545</id><published>2011-06-10T06:44:00.000-07:00</published><updated>2011-06-11T23:59:29.782-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>बाबा-बाबा ब्लैक मनी!</title><content type='html'>हिन्दुस्तान अनंत काल से बाबाओं की धरती रहा है। आज भी फुटकर में ढूंढो,थोक में मिलेंगे।&lt;br /&gt;बाबा बनने का प्रोसीज़र पहले कुछ और ही था। बड़े लोग भोग विलास की अर्थहीनता भांप कर ज्ञान की खोज में सन्यासी बन जाते थे। आजकल मामला थोडा अलग है। पहले व्यक्ति सन्यासी बनता है,फिर ज्ञान का ढोंग करके संपत्ति का अर्जन करता है,तत्पश्चात जब अथाह संपत्ति का अर्जन करके भी उसे सुख नही मिलता, तब वह वह राजपाट पाने के लिए लार टपकाता है। हिन्दुस्तान आजकल इन्ही बाबाओं की धरती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा और दावा,ये भी एक अनोखी लीला है। हर बाबा दावा करता है। जैसा बाबा वैसा दावा। लोग मानते हैं,मूढ़ गंवार हों या पढ़े लिखे,सब मानते हैं।&lt;br /&gt;बाबा चमत्कार से काले को सफ़ेद कर सकते हैं, व्यवसायी धन वर्षा कर रहे हैं। बाबा भीड़ जुटाऊ हैं,नेता नतमस्तक हैं।  डॉक्टर इनसे इलाज करवाते हैं,विशेष लौकी चिकित्सा। और अधिकारी? मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक और अधिकारी की ट्रांसफर और प्रमोशन तक।बाबाओं के दावों में देर है पर अंधेर नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भक्त भी बड़े गजब गजब के हैं,बाबाओं के हर चैनल में बाबाओं की मां बहनें रोती बिलखती दिखाई पड़ती हैं,जाने कौन सा कष्ट लेकर आयीं हैं,जो ख़त्म ही नहीं होता। बाबा चाहे हिरोईन से मालिश करवाए,या साइकिल से कूद हेलीकाप्टर पर चढ़ जाए, चाहे मठ में रासलीला रचाए, बलात्कार में आध्यात्मिक सुख पाए या बच्चों की बलि देकर अपने ईश्वर को रिझाए, बाबा तो भक्तों के लिए बेबी ही रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बाबा पर आजकल समाचार चैनलों की नज़रे इनायत हो गयी है।हो भी क्यों न? कोई भी करोडपति अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हो जाए तो कोमा में पड़ा आदमी भी चौंक जाएगा, फिर अपनी हिन्दुस्तानी मीडिया तो वैसे ही दिन में २४ बार चौंकती है।&lt;br /&gt;तो मुद्दे की बात ये कि न्यूट्रल बाबा नौटंकी के पूर्वघोषित दिन में सुबह-सकारे हवाई अड्डे पर उतरते हैं और हमारे चार मंत्री उन्हें दाढ़ी वाला ओबामा समझकर उनकी ओर लपकते हैं। विदेशी राष्ट्राध्यक्ष सा सम्मान पाने के बाद बाबा अपनी गोरैया सी छाती क्यूं न फुलाते,थोड़ी बहुत हवा उनके चेले चपाटी ने भी भर दी।अब बाबा छाती फुलाके और पेट पिचका के बैठ गए १८ करोड़ के टेंट में,एयर कंडीशनर की हवा में भाषणबाजी बहुतई सुहाती है बाबा को.अपने शिविरों में योग कम मुंह्बाजी ज्यादा करते हैं।&lt;br /&gt;बाबा तो चलते फिरते कार्पोरेट हाउस ठहरे,जनता से भी डील कर रहे थे और मंत्रियों से भी.ऐसे में जग हंसाई, लट्ठ पुजाई और मुंह सुजाई तो होनी ही थी.                        &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा ने ४ बजे मिलने का टाइम देके इमोशनल अत्याचार टाइप का धोखा सरकार को दिया तो सरकार भी दिलजले आशिक की भूमिका में आ गयी और रामदेव के साथ गलबहियों की चिट्ठी सार्वजनिक कर दी। फिर क्या होना था, हर तरफ योग ही योग पसर गया। बाबा ने हड़ताल आसन किया तो पुलिस ने लट्ठ-आसन और धुंआ-आसन से बाबा के अंट-शंट की कलई खोल के रख दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन की बात याद आ गयी। नाना-नानी कहते थे "खेले ला जाथस,कोई बाबा बैरागी के पीछे-पीछे झै जाबे" उस दिन टीवी देख के पता चल गया कि क्यों मना करते थे।बाबा तो लुगाई बनके चम्पत हो गए,जो सचमुच की लुगाई थीं बाबा के फेर में वो पिट गयीं।बाबा का नंबर २( अरे वही फर्जी पासपोर्ट वाला) तो और पहले ही निकल भागा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो दिन है और आज का दिन है।इस कालखंड में आँखों ने कुछ अकल्पनीय दृश्य देखे।कभी देखा है ऐसा सत्याग्रही जिसने पुलिस के डर से चोरों की तरह कूदफांद मचाई हो ?औरतों के कपड़ों में भागा हो? सत्याग्रह शब्द पर कालिख पोतकर बाबा जब अगले दिन सुबह सफ़ेद महिला वस्त्रों में दिखा तो पूरे देश का दिमाग सन्न रह गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर तो भूख और जिल्लत से बाबा ऐसा बौराया कि न्यूट्रल बाबा अचानक खारा और अम्लीय हो गया। "इतालवी मूल की है वो, हिन्दुस्तानी महिला  के वस्त्रों में भागते बाबा का दर्द क्या समझेगी,अपने जैसे ११००० की नमूनों की फ़ौज बनाऊंगा,१५ साल से अन्न का एक दाना नही खाया है मैंने तो ३ दिन के अनशन में मेरा क्या बिगड़ेगा" और भी न जाने क्या क्या!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी बाबा की नौटंकियां जारी हैं, एक झूठ पर दुसरे झूठ का लेप चढ़ रहा है। दूध पानी और शहद पी पीकर भी उसका उपवास नहीं टूटा तो ग्लूकोज़ से क्या टूटेगा,१-२ दिन और इंतज़ार कीजिये बाबा बोलेगा उपवास में फलाहार जायज़ है,अच्छा हुआ कि डॉक्टरों ने इसे ग्लूकोज़ चढ़ा दिया वर्ना 3 -४ दिन बाद तो बाबा मैकडोनाल्ड में बैठकर महिला वस्त्रों में २० रूपए का हैप्पी मील खाते हुए पाया जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लब्बो लुआब ये है कि हिंदुस्तान के लोग खुद ही ढोंगियों द्वारा ब्लैकमेल होना चाहते हैं।हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ तो और भी महान है जो इन उच्च राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं वाले निम्न स्तरीय सोच वाले लोगों को महान बनाने में कोई कसर नही छोड़ता। खैर, टीआरपी के लिए जो गंडे तावीज़,भूत प्रेत और तमाम तरह का अंध विश्वास बेचने से परहेज नहीं करता उस मीडिया से और क्या उम्मीद करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना कि भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है परन्तु असंवैधानिक &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;सोच वाले लोगों को यदि हम इसी तरह बढ़ावा देते रहेंगे कि वे संवैधानिक संस्थाओं से खुद को ऊपर स्थापित करने की महत्वाकांक्षा पालने लगें और हम व हमारा मीडिया उनके खुद के चरित्र से आँखें मूंदे रहेंगे तो किस तरह के लीडर पैदा करेंगे हम लोग? जो लोग कहते हैं कि सारे नेता चोर हैं और सबको फांसी चढ़ा दो,वे किस तरह का हिंदुस्तान चाहते हैं उन्हें स्पष्ट करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलो मान लो कि मार दिया नेताओं को,कौन राज करेगा फिर?यही ढोंगी साधू ,संपेरे और ज्योतिषी?जो भोलीभाली जनता को झूठ बेचते हैं या 'रंग दे बसंती' चिल्लाने वाली वह पीढ़ी जो एसएम्एस कैम्पेन,मोमबत्ती जलाने बुझाने और कीबोर्ड युद्ध के अलावा न कुछ जानती और न कुछ करती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये आँखें खोलने का समय है,मीडिया को अपना दायित्व समझना चाहिए। उनका जिम्मा समाचार बेचना नही बल्कि सत्य का प्रसार करके लोकतंत्र को मजबूत करना है।  संविधान की मूल संरचना से छेड़खानी करके भ्रष्टाचार जैसी विकराल समस्या का हल नहीं निकलेगा बल्कि यह प्रवृत्ति नवीन प्रकार के भ्रष्टाचारियों को जन्म देगी। जिसका एक उदाहरण इस समय हरिद्वार में लेटा हुआ है। साथ ही विपक्ष को शर्मिंदा होते हुए आत्मावलोकन करना चाहिए कि उनके होते हुए जनता को सड़कों पर आना पड़ा।&lt;br /&gt;आम लोगों को समझना चाहिए कि आध्यात्मिक लीडरों के दुमछल्ले बनने की बजाय व्यक्तिगत तौर पर अपनी सांस्कृतिक विरासत को पहचानते हुए तार्किकता और ज्ञान प्राप्ति के जरिये स्वयं में छुपे ब्रह्म को बाहर निकालें। अपने संवैधानिक कर्तव्यों और अधिकारों को जानने का प्रयास करें और उसपर अमल करें। जब आप ऐसा करेंगे तो जानेंगे कि इस देश के संविधान की सबसे ख़ास बात यही है कि इसने सारी जनता को ही इतना शक्ति संपन्न बनाया है कि हमें अलग से कोई लोकपाल बिठाने की कोई आवश्यकता ही नही।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-5321055391253495545?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/5321055391253495545/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=5321055391253495545' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/5321055391253495545'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/5321055391253495545'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='बाबा-बाबा ब्लैक मनी!'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-9140935655144634472</id><published>2009-03-15T02:36:00.000-07:00</published><updated>2009-03-15T03:28:25.619-07:00</updated><title type='text'>लड़ मरो धर्म के नाम पर, सबको स्वर्ग मिलेगा!</title><content type='html'>&lt;span&gt;आजकल तो इन्टरनेट&lt;/span&gt; पर जहां भी जाओ, जिससे भी बतियाओ थोडी देर सब ठीक ठीक फिर वही साम्प्रदायिक एजेंडा शुरू...कब सुधरोगे बेवकूफों...जब एक दुसरे को काट पीट कर मरना ही है तो लैपटॉप के सामने क्यों बकर कर रहे हो, निकल जाओ हथियार लेके और काट डालो जिस जिससे नफरत है। है दम? या सिर्फ मुंह चलाते ही बनता है? नाक में बैठी मक्खी उडाने की ताकत नही और बातें मरने-मारने की। हाथ पांव में दम नहीं हम किसी से कम नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अबे चिरकुटों,दुनिया में इतने धर्म हैं, धर्म ने हमेशा लिया है, धर्म ने आजतक क्या दिया है?पैसे तुम कमाते, तिजोरियां धर्म की भरती हैं! ये पैसा जायेगा कहाँ? कभी सोचा है? क्या ईश्वर गरीब है, अनाथ है या बेघर है  जो उसके लिए घर बनवाये जाएँ या उसके लिए वेलफेयर ट्रस्ट बनवाये जाएँ।  ये जो धर्मालय हैं राजनीति तो यहीं से शुरू होती है, ये कुछ नही बल्कि भ्रष्ट लोगों की अघोषित संपत्ति को जमा करने के बैंक हैं। इसलिए तो सारे डरते हैं और धर्म पर टैक्स नहीं लगाते। वर्ना क्या देश में गरीबी होती? &lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;धर्म है क्या? अपने बुरे कर्मो से मुंह मोड़ने का साधन है। ये धर्म ही है न कि पाप करो और गंगा नहाओ टेक इट ईजी पॉलिसी, सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली वाली कहावत सुनी है ना। धर्म कहता है कि कभी पाप मत करो और अगर कर भी लेते हो तो थोडी सी रिश्वत देकर उससे मुक्त हो जाओ। तुम सबके धर्मालयों में यही रिश्वत जमा हो रही है। यही तुम्हारा धर्म है इसी के पीछे तुम लड़ते रहोगे मरते रहोगे पर जीवन में एक अच्छा काम करने के लिए नही सोचोगे। ब्लैक मनी से धर्म के खजाने भरते रहोगे पर कभी ये नहीं सोचोगे कि एक स्कूल बनवा ले या एक अस्पताल बनवा ले। क्यों? क्योंकि हर धर्म कहता है कि ईश्वर "रिश्वतखोर" है, उसको थोडा सा पैसा दो वो खुश रहेगा और न सिर्फ तुम्हारी पापो की फाइल बंद कर देगा बल्कि तुम्हारी लाइफ आफ्टरलाइफ भी मस्त रखने की गारंटी देगा।&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ये सब बातें अभी तुंरत समझ नही आएगी क्योंकि अभी तो आँखों में एक दुसरे के लिए खून उतर आया है, अभी तो मरने मारने का टाइम है, अभी तो कत्ल-ऐ-आम चाहिए, फिर जब रक्त पिपासा शांत होगी तब याद आएगा कि अरे यार हम सब तो आदमखोर हो गए,एक दुसरे को ही खा गए तब अपने अपने ईश्वर को थोडी सी और रिश्वत दे देना वो स्वर्ग के दरवाजे खोल देगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्म ने जमीन पर जो चीजें बैन कर रखी हैं  वो सब स्वर्ग में अधिशेष में तुम जैसों  के लिए जमा कर रखा है ,स्वर्ग की मार्केटिंग वैल्यू बनाये रखने के लिए यहाँ इन सांस्कृतिक चीजों पर रोक लगनी ज़रूरी थी। वहां मस्त बैठ के मुर्गा मटन तोड़ना,  दारु की बोतलें फोड़ना  और हाथ में गजरा बाँध के सब साथ बैठ कर सुंदरियों का डांस देखना और ये सब मिलेगा बिल्कुल मुफ्त, न पैसे उडाने की झंझट और न पुलिस की रेड का डर और जानते हो तुम्हारे साथ कौन बैठे होंगे...वही लोग जिनके खून से तुम्हारे हाथ सने हैं और वो जिनके हाथ तुम्हारे खून से सने हैं, तब समझ आएगा कि धर्म ने सबको कैसा डबल-क्रॉस किया, सबसे पैसा लेके सबको एंट्री पास दे दिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-9140935655144634472?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/9140935655144634472/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=9140935655144634472' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/9140935655144634472'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/9140935655144634472'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='लड़ मरो धर्म के नाम पर, सबको स्वर्ग मिलेगा!'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-4090001885691325720</id><published>2008-12-23T06:00:00.000-08:00</published><updated>2008-12-23T07:35:33.283-08:00</updated><title type='text'>जायज़ हैं अंतुले के सवाल !</title><content type='html'>शहीद करकरे जी चले गए, छोड़ गए लाखों सैल्यूट  मारते हाथ और करोडो नम आँखें।   जाते जाते गुंडे,चोर, डकैत  कही जाने वाली पुलिस की गर्दन ऊंची कर गए।  बहुत से लोग टी वी सेट्स के सामने रो पड़े? उनमे से मैं भी एक था। ईमानदारी,निडरता  और कर्तव्यपरायणता का करकरे जी जैसा दूसरा उदाहरण ढूँढना मुश्किल होगा। रिक्शा चलाने वाले और ब्रेड बेचने वाले मुसलमान को आतंकवादी कह कर एंकाउँटर करने वाले अफसर और फौजी तो बहुत मिलेंगे, पर  भगवाधारियों पर ऊँगली उठाने का हिमाकत कोई करकरे ही कर सकता है। यही कारण है कि करकरे की शहादत से बहुत से लोगों के मन में सवाल उठे हैं, जिनमे अंतुले भी शामिल हैं और मैं भी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मुझे यह समझ नही आता कि अंतुले ने ऐसा क्या कह दिया जिस पर इतना बवाल मच गया। करकरे जी साध्वी प्रज्ञा केस से जुड़े हुए थे, रोज उनपर अनर्गल आरोप लगाए जा रहे थे, उनको व उनके परिवार को ख़त्म करने की धमकी दी जा रही थी, देश की सभी भगवा पार्टियां, मठ और मठाधीश उनके ख़िलाफ़ थे।&lt;span class=""&gt;  ऐसे समय में पुलिस के तीन-तीन होनहार अफसरों को अतिसाधारण हथियारों एवं सस्ती बुलेटप्रूफ जैकेट के साथ अत्याधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादियों से लड़ने भेजना किसी समझदार व्यक्ति को शायद ही हजम हो। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;अंतुले ने एक सवाल किया है, एक सवाल जो है हर किसी के मन में पर उठाने कि हिम्मत अंतुले ने की है.  इस&lt;/span&gt; पर अंतुले से इस्तीफा माँगना  तो बेशर्मी की हद है।  बेशर्मी के साथ साथ ये विपक्ष का निकम्मापन भी दिखता है कि किस तरह ये सदन का बहिष्कार करने नित नए बहानो की तलाश में रहते हैं और अंतुले का इस्तीफा इनके लिए सदन से छुट्टी पाने का बहाना है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;वैसे करकरे जी की शहादत ने उन  लोगों के मुंह पर कस के जूता मारा है जो लोग ए टी एस के विरोध में धिक्कार दिवस मनाने की तैयारियां कर रहे थे, वह पार्टी जिसने ए टी एस टीम का नार्को टेस्ट कराने की मांग की, वो क्षेत्रवादी लोग जो सिर्फ टैक्सी चालको,रिक्शा चालको और खोमचे लगाने वालो को मारने का लाईसेन्स लेकर पैदा हुए हैं और हमले के समय बिलों में घुस कर बैठे थे, और वे लोग जिन्होंने शहादत को रूपये से तोलने की कोशिश की। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जब से जूता पड़ा है तिलमिलाए बैठे हैं, नज़र नहीं आ रहे।                                  &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-4090001885691325720?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/4090001885691325720/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=4090001885691325720' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/4090001885691325720'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/4090001885691325720'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='जायज़ हैं अंतुले के सवाल !'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-5098630705612790365</id><published>2008-04-30T16:44:00.000-07:00</published><updated>2008-04-30T17:50:43.286-07:00</updated><title type='text'>CRY OF THE WILD - एक नग्न सत्य.</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;Every day, animals lose their habitat&lt;br /&gt;And I know that many people care.&lt;br /&gt;But so often, we just look away&lt;br /&gt;And pretend a problem is not there.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;They lose their habitat to destruction -&lt;br /&gt;Buildings and homes go up left and right.&lt;br /&gt;People don't think about the animals&lt;br /&gt;That run away with so much fright.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;They lose their habitat to pollution -&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;People throwing trash all over the place;&lt;br /&gt;Pouring chemicals into the waters -&lt;br /&gt;Thinking of only the human race.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;A lone wolf howls into the night&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;And looks down at a land he once knew.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;From the mountain, he stares at city streets,&lt;br /&gt;Where once trees and wildflowers grew.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://pinker.wjh.harvard.edu/photos/Florida/images/great%20blue%20heron.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 157px; CURSOR: hand; HEIGHT: 155px" height="239" alt="" src="http://pinker.wjh.harvard.edu/photos/Florida/images/great%20blue%20heron.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;A Great Blue Heron takes to the sky,&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;Leaving behind a place he knew as home.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;This place, a marshland, is disappearing -&lt;br /&gt;Leaving nowhere for him to roam.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.somersetbaywatch.org/images/BarredOwl.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 170px; CURSOR: hand; HEIGHT: 141px" height="184" alt="" src="http://www.somersetbaywatch.org/images/BarredOwl.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;A Barred Owl has lost her babies -&lt;br /&gt;Two babies not yet capable of flight.&lt;br /&gt;The tree they lived in was destroyed.&lt;br /&gt;Two voices will never be heard in the night.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://imagecache2.allposters.com/images/pic/AGF/2212~Baby-Raccoon-Posters.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 162px; CURSOR: hand; HEIGHT: 142px" height="203" alt="" src="http://imagecache2.allposters.com/images/pic/AGF/2212~Baby-Raccoon-Posters.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt; A 10-year-old raccoon is deathly ill.&lt;br /&gt;A poisoned fish he unfortunately consumed. &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;The fish came from a polluted river &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;Man's carelessness leaves him doomed.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.seasky.org/reeflife/assets/images/turtle_leatherback_sea.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand" alt="" src="http://www.seasky.org/reeflife/assets/images/turtle_leatherback_sea.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;A Leatherback Sea Turtle is strolling&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;And something catches the reptile's eye.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;He then eats what he thinks is a jellyfish,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;But it's a plastic bag and he will die.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.joe-town.com/wp-content/uploads/2006/08/mountain_lion_01.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 159px; CURSOR: hand; HEIGHT: 140px" height="295" alt="" src="http://www.joe-town.com/wp-content/uploads/2006/08/mountain_lion_01.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;A Mountain Lion is coldly shot at.&lt;br /&gt;Luckily, the bullet just grazes his skin.&lt;br /&gt;He crossed land he once belonged to.&lt;br /&gt;Now, this land is no place for him.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;All these things really do happen,&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;Although we may not want to admit&lt;br /&gt;We are disrespecting Mother Nature,&lt;br /&gt;And some of us just choose to forget.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Organizations try to make things better&lt;br /&gt;And help restore habitat that animals lost.&lt;br /&gt;But of course, they can't do it alone;&lt;br /&gt;These efforts do come with a cost.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;I know that we are far from perfect.&lt;br /&gt;We must do what we have to live.&lt;br /&gt;But if we must alter and take away,&lt;br /&gt;Shouldn't we also try to give?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The Earth is a beautiful place.&lt;br /&gt;It belongs to all creatures great and small,&lt;br /&gt;But it's man's responsibility and duty&lt;br /&gt;To keep it clean and safe for all.&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;- STACY SMITH&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस सच ने मुझे झकझोर कर रख दिया। उम्मीद है कि यह कविता आप सबको भी कुछ न कुछ सोचने पर मजबूर अवश्य करेगी। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-5098630705612790365?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/5098630705612790365/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=5098630705612790365' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/5098630705612790365'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/5098630705612790365'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/04/cry-of-wild.html' title='CRY OF THE WILD - एक नग्न सत्य.'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-6157244755647794105</id><published>2008-04-05T09:59:00.000-07:00</published><updated>2008-04-05T11:05:31.163-07:00</updated><title type='text'>दलित घिना है, आदिवासी नंगा है ! शेम शेम !!</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;इस समय ब्लौग जगत में आदिवासियों के अर्धनग्न नृत्य को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. लोग उन्हें पैंट-शर्ट पहनाना चाहते हैं. उनकी नग्नता सभ्य आँखों को चुभती है.  &lt;/span&gt;अब ये तथाकथित सभ्य लोग आदिवासियों के ड्रेस कोड निर्धारित करने में रूचि दिखा रहे हैं ।सभ्यता और असभ्यता का पैमाना निश्चित करने का अधिकार इन स्वयंभू भद्रजनों को कौन दे देता है, पता नही?     &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;यहाँ जो मुद्दा उठाया गया है वो सामाजिक से ज्यादा सांस्कृतिक है। दूसरों को उनके कपडों, बोलचाल और खानपान के बारे में नसीहत देना एक तरह का सांस्कृतिक आक्रमण है।इनकी और अन्य बंधुओं की रचनात्मकता तब जाहिर होती जब ये आदिवासियों की नग्नता को मुद्दा न बना कर उनकी शिक्षा, रोजगार तथा उनके साथ होने वाले भेदभाव पर कुछ विचार प्रकट करते।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;आदिवासी कपडे आखिर क्यों पहने? जबकि कपडे पहनकर भी वो लोगों को एक नंगा आदिवासी ही दिखाई देता है। जबकि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी वो जंगली ही कहलाता है।  हिम्मत है तो इस जातिगत, नस्लवादी मानसिकता को तोडिये।आदिवासियों को सिर्फ कपडे पहना देने से क्या होगा, क्या आप लोग उनके प्रति अपनी मानसिकता को बदलने के लिए तैयार हैं? हर किसी की संस्कृति भिन्न है, और यदि वे आदिवासी उस संस्कृति से जुडा रहना चाहते हैं तो आप कौन हैं उनकी संस्कृति को अर्धनग्न कह उंगली उठाने वाले?         &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;वैसे ये मानसिकता सिर्फ यहाँ है, ऐसा भी नही है। जब महात्मा गाँधी बर्किन्घम  पैलेस में लंगोटी में ही चले गए थे, तब उन्हें भी असभ्य समझा गया था। अपने कबीले के कपडे पहनने पर बराक ओबामा, तथाकथित  civilised Americans की आँखों की किरकिरी बन गए। जब पूरी दुनिया ही ऐसी है तो यहाँ इस देश की तो बात ही छोडिये। हजारों साल से पनपायी गयी सोच को साठ- सत्तर सालों में कौन बदल सकता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;जब लाठी&lt;/span&gt; सवर्णों की है तो निश्चित ही भैंस भी उन्ही की होगी। एक जुलाहे का लड़का जब कबीर हो जाता है  तो उसे सवर्ण की खोयी हुई औलाद बताने का प्रयास किया जाता है।जब जीवनपर्यंत ऊंची जातियों की दुत्कार सहने के बाद  तिरुवल्लुवर सवर्णों से ज्यादा ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तो अचानक उनका वंशवृक्ष ही बदल दिया जाता है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;एक ही पद  पर कार्यरत दो चपरासियों से उनकी जाति के आधार पर अलग अलग काम लिए जाते हैं एक को सफाई कर्मी तथा दूसरे को खाना बनाने वाला महाराज बनाया जाता है। एक ही जाति क्यों  मैला ढोती है? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;भेदभाव की जड़े कितनी गहरी हैं यह वही जान सकता है जिसने सहा हो। ऊपर से सब हरा हरा है नीचे धरातल कठोर है। दूसरों को नहलाने से पहले खुद के मन का मैला साफ कर लें,  दूसरों को कपडे बाद में पहनाएं पहले अपने गिरेबान में झाँक लें।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-6157244755647794105?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/6157244755647794105/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=6157244755647794105' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/6157244755647794105'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/6157244755647794105'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='दलित घिना है, आदिवासी नंगा है ! शेम शेम !!'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-5912733069163995402</id><published>2008-03-12T04:58:00.000-07:00</published><updated>2008-03-12T06:11:21.057-07:00</updated><title type='text'>आमिर बनाम शाहरुख ,प्रतिभा बनाम सफलता !</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;मीडिया को खरीदना ही यदि मीडिया प्रबंधन है तो खरीदने मे  शाहरुख खान का कोई सानी वैसे भी नहीं है। पत्नी के लिए द्वीप खरीदना हो या फिल्मफेयर के अवार्ड, शाहरुख की खरीददारी का शौक बहुत पुराना है। वैसे बौलीवूड का बादशाह का खिताब हासिल करने के लिए शाहरुख खान ने कितने रूपये खर्च किए ये तो वही बता सकते हैं। शाहरुख खान जैसे लोगों ने अवार्ड कार्यक्रमों को ना सिर्फ़ अश्लील और भद्दा बना दिया है, बल्कि फिल्मफेयर जैसे अवार्डों की विश्वसनीयता भी समाप्त कर दी है। शाहरुख खान चापलूसों से घिरे रहना बहुत पसंद करते हैं और आलोचना उन्हें रत्ती भर पसंद नहीं। यही  कारण है कि उन्होंने २००८ के फिल्मफेयर अवार्ड शो मे आलोचकों को जी भर के सांकेतिक गालियाँ दी वो भी सैफ अली खान के साथ मिलकर (वे सैफ अली खान, जिनकी झोली मे करीना के अलावा कोई बड़ी सफलता नहीं है)। शाहरुख खान की फूहड़ सफलताएं उनके सिर चढ़ कर बोल रही हैं और वे ख़ुद को मनमोहन देसाई के कद का समझने लगे हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मीडिया तुलना करता है। परन्तु बिके हुए मीडियाकर्मियों को इस बात का भान नहीं है कि स्वस्थ प्रतियोगिता के लिए स्वस्थ तुलना का होना आवश्यक है। शाहरुख की तुलना जब आमिर खान से की जाती है तो दुःख होता है, क्योंकि तुलना बराबरी वालों से की जाती है। आमिर खान रचनात्मकता के मामले मे शाहरुख खान से कोसों आगे हैं।  "मन" और "मेला" जैसी इक्कादुक्का फिल्मों को छोड़ दिया जाए तो हम पायेंगे कि आमिर खान की हर फ़िल्म ने ना सिर्फ़ नैतिक संदेश दिया है, बल्कि दर्शकों का भरपूर मनोरंजन भी किया है।  आमिर खान फ़िल्म इंडस्ट्री मे व्याप्त चमचागिरी से अछूते रहे हैं, और "ब्लैक" जैसी बकवास फ़िल्म का विरोध करने का साहस कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जिसका मन आमिर की तरह साफ हो। रामदौस द्वारा जब शाहरुख के फिल्मों एवं सार्वजनिक स्थल पर धूम्रपान करने की आदत पर ऊँगली उठायी गयी थी तो शाहरुख ने रचनात्मक स्वतंत्रता का लबादा ओढ़ कर अपना पिंड छुडा लिया था।   शाहरुख और रचनात्मकता ! सुन के ही हँसी आती है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;पिछले वर्ष सबसे ज्यादा कमाई करके और सबसे ज्यादा हिट फिल्म देकर अक्षय कुमार प्रथम स्थान पर आ गए हैं, और शाहरुख खान प्रोडक्शन की फ़िल्म " ॐ शांति ॐ" एक निहायत ही फूहड़ किस्म की फ़िल्म थी , शाहरुख अगर यह बात स्वीकार करने का साहस नहीं रखते हैं तो उन्हें आलोचकों को अपशब्द कहने का अधिकार भी नहीं है।  शाहरुख खान ने अबतक सिर्फ़ एक इतिहास  आधारित  किरदार निभाया है, और उसमे भी सम्राट अशोक के व्यक्तित्व का कबाडा कर दिया। रही बात चक दे इंडिया की, तो उसमे भी शाहरुख का अभिनय औसत दर्जे का ही रहा है। किसी को मेरी बात पर शक हो तो वे डिज्नी मोशन पिक्चर्स की खेल आधारित फिल्में उठा कर देख सकते हैं।  चक दे जैसी सैंकडों फ़िल्म डिज्नी वाले पहले ही बना चुके हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे नामी अखबार मे पिछले दिनों एक लेख आया था, जिसमे सचिन और शाहरुख की तुलना की गयी थी।  ये तो हद है, अब तो मीडिया की इन हरकतों से दुःख नहीं होता बल्कि घिन छूटती है। चलिए मान लें कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया को २४ घंटे चलने के लिए कुछ न कुछ चाहिए पर प्रिंट मीडिया की क्या मजबूरी है? ( मजबूरी ही  है या कोई लाभ है ! ) &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अगर मीडिया सही तुलना करने का साहस उठाये तो ना सिर्फ़ शाहरुख का स्वघोषित एवं स्वप्रायोजित ताज छिन जायेगा बल्कि समाजवादी पार्टी के पोस्टर बॉय अमिताभ की "महानायक" की पदवी भी छिन जायेगी।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-5912733069163995402?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/5912733069163995402/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=5912733069163995402' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/5912733069163995402'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/5912733069163995402'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/03/blog-post_12.html' title='आमिर बनाम शाहरुख ,प्रतिभा बनाम सफलता !'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-9010458230635872529</id><published>2008-03-09T03:00:00.000-07:00</published><updated>2008-03-09T04:09:53.309-07:00</updated><title type='text'>अल्पसंख्यक धर्मावलंबियों की बढ़ती आबादी से घबराने वालों को चाणक्य की सीख</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;जनगणना २००१ के अनुसार विभिन्न धर्मों की जनसंख्या इस प्रकार है:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;हिंदू-८०.४% &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मुस्लिम-१३.४%&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;ईसाई-२.२ %&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सिख-१.९%&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;बौद्ध-१.१%&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जैन-०.४%&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अन्य-०.५%&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;हंगामेबाजी के लिए निम्न आंकडों का सहारा लेना आवश्यक है:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;१० सालों में हिन्दुओं की जनसंख्या बढ़ी-२०.३%&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मुस्लिमों की-२९.५%&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;ईसाइयों की-२२.६%&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सिक्खों  की-१८.२ %&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;बौद्धों की-२४.५% &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जैनों की-२६.०%&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;उपरोक्त आंकडों को हिंदू संगठन भयानक बता रहे हैं, ये आंकडे जितना उन्हें डरा रहे हैं उससे कहीं ज्यादा वे ये आंकडे दिखा कर "आम" हिन्दुओं को डरा रहे हैं। ये हिन्दुओं के तथाकथित हितैषी संगठन,ना जाने क्यूँ इन निम्न आंकडों को नजर अंदाज कर देते हैं:-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;हिन्दुओं की साक्षरता दर ७५.५ % है, वहीं ईसाइयों में यह दर ९०.३ % तथा जैनों में ९५.५% है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;हिन्दुओं का लिंग-अनुपात ९३५ है जो राष्ट्रीय औसत ९४४ से काफी नीचे है। हिन्दुओं से ज्यादा अच्छा लिंग-अनुपात मुस्लिमों(९४०),ईसाइयों(१००९),बौद्धों(९५५) तथा जैनों(९४०) का है।    &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;हिन्दू संगठनों के अधीशों ने हिन्दुओं को ३ से ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह तो दे डाली पर धर्म से पलायन  कर जाने वालों को वे कैसे रोकेंगे ? उन्होंने  महिला उत्पीडन तथा भ्रूण हत्या को रोकने के लिए आज तक क्या किया है? साक्षरता बढाने के लिए क्या किया है? दलितों के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार एवं अत्याचार को रोके बिना &lt;span class=""&gt;वे पलायन कैसे रोकेंगे&lt;/span&gt;? मंदिरों और आश्रमों में जमा अफरात धन दौलत पड़े पड़े सड़ न जाए ,इसके लिए क्या किया जा रहा है?  कुछ भी &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;नहीं।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;"किसी सम्प्रदाय से भयभीत होने का अर्थ है स्वयं के सम्प्रदाय से भरोसा उठ जाना, और जिसका स्वयं के पंथ पर ही विश्वास न हो उसे धर्मावलम्बी कैसे कहा जा सकता है? सम्प्रदाय मार्ग है, लक्ष्य नहीं। इसलिए विचलित होने का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता। जो विचलित है, वह पंथी नहीं। पथ से भटकाव ही विचलन का कारण है।  दूसरों से जब भय हो तो आत्मावलोकन करें कि त्रुटि कहाँ हुई है, श्रेष्ठ कोई भी नहीं, त्रुटिमुक्त कोई भी नहीं। नागरिक, श्रेष्ठीवर्ग  एवं शासक, धर्म की शरण लें अथवा धम्म की, राज्यहित ही उनका प्रमुख ध्येय होना चाहिए। "- चाणक्य&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-9010458230635872529?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/9010458230635872529/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=9010458230635872529' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/9010458230635872529'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/9010458230635872529'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='अल्पसंख्यक धर्मावलंबियों की बढ़ती आबादी से घबराने वालों को चाणक्य की सीख'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-2284504543623257532</id><published>2008-02-23T01:56:00.000-08:00</published><updated>2008-02-23T03:02:02.169-08:00</updated><title type='text'>कौन हैं महात्मा गाँधी? क्या किया उन्होंने देश के लिए?</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;३-४ गांधी विरोधी फिल्मे देखकर जब युवा अपने आपको इतिहासविद समझने लगता है, तो वह कुछ इसी तरह के सवाल किया करता है। गांधी को नीचा बताने के लिए सुभाष और भगत के नाम का सहारा लिया जाता है और उनके नामों के सहारे अपना पक्ष सुदृढ़ करने की भरसक कोशिश की जाती है। गांधी को बदनाम करना आसान है, हिन्दुओं को ये बताओ कि गांधी ने पाकिस्तान को इतने रुपये देने के लिए अनशन किया, जनेऊ धारियों  को ये बताओ कि गाँधी एक जमादार का काम ख़ुद किया  करते थे, और दलित से कहो कि गांधी राजनीति में दलितों के आरक्षण के धुर विरोधी थे। जनता को फुरसत नहीं होती इन सब के पीछे का कारण समझने की।  बस एक बार जहाँ एक विराट हस्ती के लिए जन गण मन  में  घृणा के बीज बो दिए जाएं तो समय समय पर गाँधी के विरोध में  अनाप शनाप काल्पनिक बातें  लिखकर नफरत के पौधे को सींचते रहो।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;दरअसल गांधी एक सॉफ्ट टार्गेट रहे हैं, गोडसे के लिए भी और साईबर युग के युवाओं के लिए भी। गांधी का अपमान करने के लिए कोई खतरा नहीं उठाना पड़ता। ठाकरे के बारे में कोई यदि सच भी  बोले तो पिट जाए, और गांधी के बारे में कोई लाख ऊटपटांग गाता फिरे, झूठ फैलाता रहे तो भी वो मजे से खुलेआम घूम सकता है। अपनी जबरन की हेकडी, और व्यर्थ के मद में चूर आजकल का युवा शायद अपने आपको नेताजी सुभाष( जो गांधी को राष्ट्रपिता कहने वाले प्रथम व्यक्ति थे ),रवींद्रनाथ टैगोर(जिन्होंने गाँधी को महात्मा का दर्जा दिया),भगत सिंह(जिन्होंने बापू को सदैव पितातुल्य आदर दिया) और अन्य सारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी( जिन्होंने सत्य  को अपना धर्म और गांधी को अपना मार्गदर्शक जानकर देश को स्वतंत्रता दिलवाई),से भी ज्यादा ज्ञानवान और बुद्धिमान समझते हैं, इसीलिए वे गांधी का अनादर करने में ज़रा भी नहीं हिचकते।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;आसान है, अपने लैपटॉप और कंप्यूटर के सामने बैठकर क्रांतिकारियों की तौहीन करना।  वातानुकूलित कमरे में बैठकर  स्वतंत्रता संग्राम की खामियां निकालना, कैफे कॉफी डे और बरिस्ता में चुस्कियाँ लेते हुए महान लोगों की खिल्ली उडाना। जिन्होंने पीर पराई और परोपकार का मर्म न समझा हो, उन युवाओं से और उम्मीद ही क्या की जा सकती है। जिन्हें नैतिक शिक्षा ही ना मिली हो उनकी सोच बीमारू न होगी तो क्या होगी।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;खैर जब&lt;/span&gt; बीमारी लाइलाज हो जाती है तो दुआ काम आती है, ये दुआ राष्ट्रपिता ने अपने बच्चों के लिए की थी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;"सबको सन्मति दे भगवान्"&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-2284504543623257532?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/2284504543623257532/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=2284504543623257532' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/2284504543623257532'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/2284504543623257532'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/02/blog-post_23.html' title='कौन हैं महात्मा गाँधी? क्या किया उन्होंने देश के लिए?'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-3691593963136729620</id><published>2008-02-22T01:03:00.000-08:00</published><updated>2008-02-22T05:02:05.427-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तुकबंदी'/><title type='text'>पांच त्रियाचरित्र पीड़ितों की आपबीती और बेटों का ब्लौग!</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;असफलता से सीखते नहीं, कभी न कभी हम सब, अपनी असफलताओं का ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ देते हैं। पार्श्व मे काला परदा लगाकर ख़ुद को गोरा दिखाने की चाहत सब मे होती है। दूसरे को दोषी ठहराना कोलिन स्प्रे की तरह है जिससे हम अपना आईना साफ करने का प्रयास निरंतर करते रहते हैं। हर कोई अपनी असफलता की भडास दूसरे पर निकालता है, दोषारोपण प्रकृति का नियम है; नेता विपक्ष पर, अमीर गरीब पर, औरत मर्द पर, पावन पतित पर और सवर्ण दलित पर। अतीत के पन्ने खुलने पर जब कुछ हादसे और असफलताएँ मुंह बाए खड़े हो जाते हैं तो कुछ लोग दोष डाल देते हैं,,, त्रियाचरित्र पर।यहाँ प्रस्तुत है ऐसे ही ५ लोगों की आपबीती जिन्होंने खुद को त्रियाचरित्र-पीड़ित घोषित रखा है। ये वो लोग हैं जो सोचते हैं कि इंसान की असफलता अथवा इंसान के साथ जो भी क्रूर घटित होता है उसके पीछे एक औरत का हाथ होता है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;प्रथम दृश्य:&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;खाने की छुट्टी मे, क्लास मे बैठा हुआ एक&lt;br /&gt;धीर गंभीर खिड़की से बाहर&lt;br /&gt;बच्चों को खेलता,देखता हुआ एक।&lt;br /&gt;चींटी धप्प खेलते हुए&lt;br /&gt;कोई उसके पास आयी।&lt;br /&gt;गौर से देख चेहरा उसका&lt;br /&gt;चिडिया सी चाह्चाहायी&lt;br /&gt;"एई, तुम्हारे गाल कितने फट गए हैं,&lt;br /&gt;मम्मी चार्मिस नहीं लगाती क्या"&lt;br /&gt;खिलखिलाहट के बीच&lt;br /&gt;अपमान के घूँट पीता हुआ वो,&lt;br /&gt;प्रतिशोध की ज्वाला लिए&lt;br /&gt;ह्रदय मे, जीता हुआ वो।&lt;br /&gt;झट से खडा हुआ और&lt;br /&gt;उसके बालों में अपना हाथ फेरा,&lt;br /&gt;अंगूठों के नाखूनों को उसके चेहरे के सामने लाया &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;और हौले से दबाया,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;चट्ट की जो आवाज़ हुई अब वो खिलखिलाया&lt;br /&gt;" एई, तुम्हारे सिर में कितने जुएँ हैं,&lt;br /&gt;मम्मी मेडिकर नहीं लगाती क्या. "&lt;br /&gt;प्रकृति का ये क्रूर मजाक&lt;br /&gt;उस कन्या के लिए असहनीय था&lt;br /&gt;वो अगले कालखंड तक रोती रही।&lt;br /&gt;घडियाली अश्रुओं से शिक्षक को प्रभावित किया गया,&lt;br /&gt;नन्ही परी की शिकायत पर&lt;br /&gt;बालक को दानव घोषित किया गया.&lt;br /&gt;बाहर घुटने लगाए वो आज भी सोचता है,&lt;br /&gt;बदतमीजी की सजा उसे ही क्यों.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;द्वितीय दृश्य :-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;कड़ी धूप में घास छीलते हुए&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सारी प्राकृतिक यातनाएं सहर्ष झेलते हुए&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जब शरीर का सारा तरल सूख चूका था &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;तो जाने कितने ही, वालंटियर बना कर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जबरन रक्तदान शिविर में झोंक दिए गए&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;और ऐसे ही कितने मेहनतकश&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सपनो के गले &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;रैंक परेड के दिन घोंट दिए गए. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;कारण से सब अनभिज्ञ हैं, निराश परिणाम से&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सोचते हैं पर कुछ सूझता नहीं &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;कहाँ कमी रह गयी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मेहनत में या चाटुकारिता में। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;एक वरिष्ठ ने मुंह खोला&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;कहा तुम सब की कीमत पर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;एक कामायनी,कोमलांगी चुन ली गयी हैं. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;वे जिन्हें गाहे बगाहे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मैदान पर देख कर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सब आहें भरा करते थे, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जिनकी बंदूक कभी ना चली&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;क्योंकि उनसे मैगजीन लोड करते ही नहीं बनी,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;पर उनका निशाना अचूक था&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जिन्हें सूबेदार मेजर के साथ ठिठोली करते देखा गया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;वे अब हमारी अंडर-ओफिसर बनेंगी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;निशाने निशाने का अंतर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जिस दिन समझ जाओगे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;उनकी रैंक तुम पा जाओगे. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मिटटी से सम्पर्क के अभाव में &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जिनकी युनिफोर्म हमेशा साफ रही&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;परफ्यूम से महकती वे,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;पसीने से बिदकती वे,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;उनसे तुम्हारी क्या तुलना है गधो&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;चलो ये लटके मुंह उठाओ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;और जा के उन्हें सेल्यूट करो। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;तृतीय दृश्य :-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जब परीक्षा के दिन कक्षा में आकर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;कोई एक ही टेबल पर जाकर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;ठिठक जाएं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;और बड़े प्यार से पूछें &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;"पेपर कैसा आया"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;तो कई मन एक साथ कह उठते हैं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;"मास्साब, कभी हमसे भी पूछ लिया करो"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;चतुर्थ दृश्य :-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;साल भर प्रयोगशाला में खडे होकर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;फार्मूलों और रासायनिक सूत्रों में उलझकर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;कॉपी में खींची लाल लाल लकीरों को देखकर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;भी इतनी खिन्नता नहीं होती&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जितनी कि तब,जब &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अन्तिम दिवस पर कोई मुस्कुराती हुई आये&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;आखिरी पृष्ठ पर हस्ताक्षर कराके&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;बगल में खड़ी हो जाए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;टीपे वो आपकी उत्तर पुस्तिका &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;और डांट आपको ही पिल जाए&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;वाइवा में आप को &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;आधे घंटे खडा रख &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अभिक्रियाएं पूछी जाएं &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;और हलवा बनाने की विधि पूछकर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;उनकी पीठ थपथपाई जाए। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;अन्तिम दृश्य :-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;नोटिस बोर्ड पर लटकी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जीभ चिढाती&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जब पुनर्मूल्यांकन की पूरी सूची&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;"नो चेंज" से सजी हो &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;और एक विशेषाधिकार प्राप्त विशिष्टा के&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;२४ अंक बढ़ जाएं तो&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;परिश्रमियों का &lt;/span&gt;आत्मविश्वास &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;क्यों नहीं डगमगायेगा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;साक्षरता का स्वप्न धरा रह जायेगा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;भक्त भक्तिनी में भेद हो जहाँ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;ऐसे विद्या मंदिरों में &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;कोई सच्चा उपासक भला क्यों जायेगा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;पाँचों को मेरा सुझाव :-&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;जो भेद देख आँखें ढांप सकें, &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;वे लोग ही आगे बढ़ते हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;ठहराव उनके लिए है, जो ऐसी कहानियां गढ़ते हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;त्रियाचरित्र है सिर फुटव्वल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सत्य है ये कि,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;नारी पुरुष पर भारी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अगर जीना है सुकून से &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;तो बने रहो आभारी।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;( आपस की बात : ये पाँचों कथित पीड़ित मेरे मित्र हैं और इन्होने मुझे "बेटियों का ब्लौग" की तर्ज पर "बेटों का ब्लौग" बनाने का सुझाव दिया है जिसमे ये लोग "त्रियाचरित्र-पीड़ितों" और "पुरुष लिंगभेद" की दुःखभरी दास्ताने पोस्ट कर सकें. पर मैंने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया है क्योंकि मुझे अभी और जीना है. मैं इन लोगों की सोच से इतने भय में जी रहा हूँ कि मैं इनसे दोस्ती कायम रखने के विषय पर भी पुनर्विचार करने जा रहा हूँ. ) &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-3691593963136729620?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/3691593963136729620/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=3691593963136729620' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/3691593963136729620'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/3691593963136729620'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/02/blog-post_22.html' title='पांच त्रियाचरित्र पीड़ितों की आपबीती और बेटों का ब्लौग!'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-6885240624537203650</id><published>2008-02-20T00:24:00.000-08:00</published><updated>2008-02-20T23:05:55.836-08:00</updated><title type='text'>इन्वेस्टर बालमा,, पधारो म्हारे देस !</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;आपातकाल के समय जो लोग पैदा नहीं हुए थे , पिछले सप्ताहांत जबलपुर प्रशासन ने उन्हें एक और मौका दिया आपातकाल को करीब से जानने का। ऐसा कतई न सोचें कि पिछले हफ्ते जबलपुर मे कोई महानसबंदी कार्यक्रम का आयोजन हुआ था या मेयर ने इमरजेंसी घोषित कर विपक्षी पार्षदों को पिटवा दिया। ये मौका था जबलपुर मे आयोजित हुए "ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट"का, जिसने नवजबलपुरियों को इमरजेंसी के वक़्त को फ़िर से जीने का अवसर प्रदान किया। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;समय पर चलती बसें, तीन दिन मे तीन लेन सडकों का निर्माण, १२ सालों मे पहली बार जलती स्ट्रीट लाइटें, पार्किंग व्यवस्था को दुरुस्त कराती पुलिस,,,&lt;span class=""&gt; ऐसा पहली बार हुआ कि ३ दिन तक शहर की बिजली नहीं काटी गयी, चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस मुस्तैद रही, जुलूस निकालने की अनुमतियाँ नहीं दी गयीं और तो और मध्यप्रदेश में जबलपुर बस एकमात्र शहर रहा जहाँ "धार्मिक ठेकेदार संगठनों" को वैलेंटाइन और जोधा-अकबर का विरोध नहीं करने दिया गया। जिन्होंने दुस्साहस किया वे आज भी घावों पर हल्दी मल रहे हैं। ये सब देखकर बुजुर्गों ने इंदिरा गांधी को याद किया और युवाओं ने इन्वेस्टर्स का धन्यवाद किया। आम जबलपुरिया ने पहली बार महसूस किया कि राजनैतिक इच्छाशक्ति हो तो शहर को ऐसा प्रशासन भी नसीब हो सकता है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;खैर जबलपुर के इतिहास का त्रिदिवसीय स्वर्णयुग बीत चुका है, और जबलपुर प्रशासन ने एक बार फिर जबलपुरियों को यथार्थ के कठोर धरातल पर पटक दिया है। स्ट्रीट लाइटें फिर बंद हैं, और ट्रैफिक पुलिस फिर नदारद है। बिजली की कटौती पुनः प्रारंभ हो चुकी है। गुरंदी( शहर का कबाड़ उद्योग परिसर) में सेप्टिक टैंक के फिर से ओवरफ्लो हो जाने के कारण वहाँ के घरों में घुटनों तक गटर का पानी भर गया है, जिससे अस्पतालों की चांदी हो गयी है। सड़कें चौडी दिखाने के चक्कर में सड़क किनारे के जो बड़े बड़े पेड़ कटवा दिए गए हैं इसका परिणाम शीघ्र ही गर्मियों में देखने मिलेगा जब सूर्य अपनी किरणों और धधकती ज्वालाओं की प्रचुर मात्र शहर में इन्वेस्ट करेगा। ग्वारिघाट,घमापुर,रद्दी चौकी,गढा क्षेत्र की जो झुग्गियां हटाई गयी हैं वहाँ के निर्वासित ५ डिग्री की ठंड काटने के बाद अपने वोट विपक्ष के खाते में इन्वेस्ट करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हो गए हैं। ट्रैफिक सिग्नल्स फिर से बंद हैं और बड़े लोगों की बड़ी बड़ी गाडियाँ सदर,सराफा और गोरखपुर बाजार के बीच खड़ी होकर फिर से राहगीरों का उपहास कर रही हैं। इन्वेस्टर्स मीट के होर्डिंग्स में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की फोटो शहरवासियों को मुंह चिढाती सी लग रही है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जबलपुर में रेडियो के ५ नए चैनल चालू हुए हैं, इन्वेस्टर मीट ख़त्म होने के अगले ही दिन निम्न दो गानों की फरमाईश अचानक बढ़ गयी :-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;पहला-&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; इन्वेस्टर&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;बालमा पधारो म्हारे &lt;span class=""&gt;देस&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;और दूसरा- &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;बनाके क्यों बिगाडा रे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;बिगाडा रे नसीबा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;ऊपरवाले उपरवाले &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-6885240624537203650?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/6885240624537203650/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=6885240624537203650' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/6885240624537203650'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/6885240624537203650'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/02/blog-post_20.html' title='इन्वेस्टर बालमा,, पधारो म्हारे देस !'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-5976082210724786563</id><published>2008-02-12T08:16:00.000-08:00</published><updated>2008-02-12T09:13:31.925-08:00</updated><title type='text'>क्या आप भी माधुरी दीक्षित बनना चाहती हैं?</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;बडे बडे सितारों को अपने इशारों पर नचा चुकीं मशहूर नृत्य निर्देशिका सरोज खान अब छोटे परदे पर पधार चुकी हैं। एन डी टी वी के नए मनोरंजन चैनल "इमेजिन"&lt;/span&gt;&lt;a href="http://movies.indiainfo.com/2007/12/11/images/sarojkhan.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand" alt="" src="http://movies.indiainfo.com/2007/12/11/images/sarojkhan.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;पर प्रसारित होने वाले नए कार्यक्रम "आजा नच ले" से सरोज खान अब छोटे परदे के दर्शकों को नचाने का मन बना चुकी हैं। सास बहू और रियलिटी शो के दौर में सरोज जी का कार्यक्रम बुद्धू बक्से को एक नयी ऊर्जा देने को तैयार है।  सरोज खान के स्वभाव और नृत्य की सरलता ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को आकर्षित करने में पूरी तरह से सक्षम हैं। सरोज स्टेप्स के साथ साथ चेहरे के भावों, हाथ की मुद्राओं पर भी पूरा ध्यान देती हैं तथा बीच बीच में छात्रों को डांट भी पिलाती रहती हैं। इस कार्यक्रम ने अचानक ही एनडीटीवी इमेजिन की दर्शक संख्या में काफी बढोत्तरी कर दी है। महिलाओं खासकर गृहणियों को लक्ष्य मानकर बनाया गया ये कार्यक्रम अब बच्चों और पुरुषों में भी अपनी पैठ बनाने लगा है, क्योंकि इस कार्यक्रम में सभी के लिए संभावनाएं रखी गयी हैं। हिट फिल्मी गानों पर एकल तथा युगल नृत्य को सीखने का ऐसा मौका और कहीं नहीं मिल सकता है। इस कार्यक्रम में नृत्य ही नृत्य है। अतिरिक्त प्रभाव उत्पन्न करने के लिए ना तो कैमरे की हलचल है और न ही कोई असहनीय पार्श्व ध्वनि का प्रयोग इस कार्यक्रम में किया गया है। क्योंकि ये पूरा शो सरोज खान और उनके नृत्य के इर्द गिर्द घूमता है, इसलिए इसमे बोरियत नहीं होती। इस कार्यक्रम का बनावटी न होना ही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-5976082210724786563?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/5976082210724786563/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=5976082210724786563' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/5976082210724786563'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/5976082210724786563'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/02/blog-post_12.html' title='क्या आप भी माधुरी दीक्षित बनना चाहती हैं?'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-1832380585819276081</id><published>2008-02-03T03:02:00.000-08:00</published><updated>2008-02-03T06:14:31.180-08:00</updated><title type='text'>डहरिया सर का थप्पड़</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;नवोदय विद्यालय में हमारे एक संगीत शिक्षक हुआ करते थे श्री रवि शंकर डहरिया। लंबे चौड़े ,सांवले, पान के शौकीन,संगीत के विद्वान डहरिया सर। जब ६ वीं कक्षा में हमारा एडमिशन हुआ तो पहले पहल हम लोग डहरिया सर को देख कर कांप जाते थे। नवोदय विद्यालय समिति में भी उनका काफी रुतबा था। नवोदय प्रार्थनाओं को संगीतबद्ध करने की जिम्मेवारी उन्हें ही दी जाती थी। समिति का सारे देश में कहीं भी आयोजन होता, तो डहरिया सर को कार्यक्रम के सांस्कृतिक पक्ष का उत्तरदायित्व दिया जाता।तबला,हारमोनियम,जलतरंग,जाज़ ड्रम,कांगो,बांगो,पियानो ऐसा कौन सा वाद्य था जिसमे सर को महारत न हासिल हो।लोकगीत,लोकनृत्य से डहरिया सर को विशेष प्रेम था,उन्होने कभी कार्यक्रमों को ग़ैर सांस्कृतिक नहीं होने दिया,।  फिल्मी गाने तो नवोदय को कभी छू भी नहीं पाए। उनके सिखाये कितने ही छात्र संभागीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत होते रहे। पर हमने कभी सर को घमंड से चलते या खुद का बखान करते नहीं देखा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अहंकारी तो मैं हो गया था। १५ अगस्त हो या २६ जनवरी,मेरा एक भाषण निश्चित था। बोर्डिंग स्कूल होने के कारण  सभी महापुरुषों की पुन्यतिथियाँ,जन्मदिवस,पर्व - त्यौहार हास्टल में ही मनाये जाते थे। जिसमे मंच संचालन की जिम्मेदारी हमेशा मुझपर डाल दी जाती। विज्ञान और गणित को छोड़कर मेरी बाक़ी सभी विषयों में रूचि थी, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा निर्धारित भाषा के कोर्स की पुस्तकें उस समय बहुत हाई फाई हुआ करती थीं। हमारा पुस्तकालय भी शानदार था, इसलिए प्रेमचंद,निराला,बच्चन से परिचय बचपन में ही हो गया था।ऐसे सानिध्य से मेरा साहित्य बोध बाक़ी बच्चों से ज्यादा अच्छा हो गया था, जिसका फायदा मुझे तात्कालिक भाषण, कहानी लेखन,कविता पाठ इत्यादी प्रतियोगिताओं में मिलने लगा(हालांकि मैं दिनों दिन गणित और विज्ञान में फिसड्डी होता चला जा रहा था)।  ७वी कक्षा तक आते आते मैं ११वी-१२वी के छात्रों पर भारी पड़ने लगा।अब तो ये हाल हो गया कि यदि किसी प्रतियोगिता का आयोजन हो और मैं अनुपस्थित रहूं तो हिन्दी विभाग मुझे लाने के लिए वरिष्ठ छात्रों को होस्टल भेज देता था। अब मैं डहरिया सर का प्रिय शिष्य हो गया था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मुझे पता नहीं आजकल किस तरह के बच्चे पैदा हो रहे हैं? आजकल बच्चों को सजा दो तो केस कर दें, या मीडिया वालों को बुला लायें। हमें तो हर तरह की सजा मिली है और हम आजतक जिंदा हैं, अभी कुछ दिन पहले एक बच्चे को मैदान के दस चक्कर लगाने की सजा मिली और वो ६वे चक्कर में ही मर गया।डहरिया सर और स्पोर्ट्स टीचर पासी सर से भी सारा स्कूल खौफ खाता था। हालांकि डहरिया सर ने मुझे कभी सजा नहीं दी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मुझे याद है कि सर मेरी बड़ी से बड़ी ग़लती पर भी मुझे माफ़ कर देते थे। मुझसे कितने वाद्य यन्त्र टूटे पर उन्होने कभी कुछ नहीं कहा। एक बार तो मैंने उनके बेटे (जो मुझसे एक साल सीनियर था) को ही टेबल मार कर खून निकाल दिया,जब उसने शिकायत की तो सर ने उसी को वापस डांटते हुए कहा कि तेरी ही गलती होगी(वैसे गलती उसी की थी)। ऐसे कितने मौक़े आये, कई तो याद भी नहीं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;१९९७ में स्वतंत्रता की ५०वी सालगिरह के अवसर पर दिल्ली के गालिब ऑडिटोरियम में देशभर के चुने हुए केंद्रीय विद्यालयों द्वारा नाटक प्रस्तुत किये जाने थे। मध्यप्रदेश से दो विद्यालय चुने गए,उज्जैन का केंद्रीय विद्यालय और हमारा नवोदय विद्यालय। हमे एक महीने की ट्रेनिंग देने के लिए मशहूर नाटककार श्री लोकेंद्र त्रिवेदी आये हुए थे। अगले दिन चयन प्रक्रिया चालू होनी थी, पूरे स्कूल में छात्र छात्राएँ तैयारियों में जुटे हुए थे,मैं सो रहा था। अगले दिन सुबह जब हम स्कूल पहुंचे तो सर ने मुझे कहा कि मुझे किसी भी हाल में सेलेक्ट होना ही है। मेरी दिल्ली-विल्ली जाने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी,क्योंकि कार्यक्रम ऐसे समय पर था कि मेरी रक्षाबंधन की छुट्टियाँ खराब हो जातीं।लंच के बाद सब सभागार की तरफ भागे और मैं होस्टल में सोता रहा, एक घंटे बाद जूनियर छात्रों ने आकर कहा कि आपको शर्मा मैडम(हमारी हिन्दी टीचर) बुला रहीं हैं ,अभी के अभी।मैंने उनसे ये कहलवा दिया कि मैं उन्हें मिला ही नहीं। मैं फिर लंबी तान के सो गया,बाद में दो सीनियर्स आये और मुझे जबरन पकड़ कर ले गए।संगीत कक्ष सभागार में ही था, मंच से एकदम जुडा हुआ।मुझे संगीत कक्ष में ले जाया गया, डहरिया सर सभागार से उठकर अन्दर आये और फिर हमारे बीच कुछ इस तरह का संवाद हुआ:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सर(गुस्से में) - तू कहाँ मर गया था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मैं- सर मैं सो गया था।   &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सर(गुस्से में)- बेशर्म, एक लात मारुंगा खींच के, हम लोगों को क्या अपना चपरासी समझ रखा है,तुमसे हम बाद में बाद में निपटेंगे, अभी स्टेज के पीछे जाओ इसके बाद तुम्हारा नंबर है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मैं(गुस्से से)-सर मैं नहीं जाऊंगा।  मुझे नहीं जाना दिल्ली।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;थप्पड़ की आवाज&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सब सुन्न सपाट(सर बोले जा रहे हैं, मुझे बस एक सीटी सी सुनाई दे रही है)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;आवाज़ आनी शुरू हुई-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;तू कुछ जानता है  ये कितना बड़ा मौका है , जानता है जो बाहर बैठा है वो कौन है, जा के मर साले ,अब मुझे अपनी शक्ल मत दिखाना, तुम कुछ नहीं कर सकते जिंदगी में।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मेरा दिमाग खराब हो रहा था, सर ने वो थप्पड़ सब के सामने मारा था। ऐसा लग रह था, कि हर देखने वाले की आँख नोच लूँ और डहरिया सर के ऊपर ड्रम पटक दूं।कुछ जलकुकडे मुस्कुरा कर एक दूसरे को देख रहे थे,  सहानुभूति भरी आँखें भी मजाक उडाती सी लग रही थी।मैंने अपने आंसूओं को जैसे तैसे रोका और मन में कुछ ठाना।मैं स्टेज पर गया, मैंने स्टेज पर क्या किया मुझे खुद याद नहीं, पर बहुत तालियाँ बज रही थीं। मैं स्टेज से उतरकर होस्टल की तरफ जा रहा था तभी  शर्मा मैडम ने दौड़ कर आके मुझे गले लगा लिया और कहा बेटा तुम सिलेक्ट हो गए।मैं वापिस मुड़ा, संगीत कक्ष में पहुँचा और जो मुझ पर हंस रहे थे उनसे कहा" सालों,बहुत दांत-निपोरी सूझ रही थी ना, जाओ सिलेक्ट होके दिखाओ।"उस वक़्त उनके उतरे चेहरे देख कर जो संतुष्टि मिली थी वो मैं बता नहीं सकता।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;वो वाकई बहुत बड़ा मौका था, देश भर के लोगों से मिलने का मौका,देशभर की संस्कृति को पास से जानने का मौका,राष्ट्रीय स्तर पर कला के प्रदर्शन का मौका। हमारे विद्यालय ने द्वितीय पुरस्कार हासिल किया।पहला पुरस्कार मिला शिलोंग,मेघालय के नवोदय विद्यालय को। उन से मैंने जाना कि वो लोग कितने अभाव में पढ़ते हैं, उनका विद्यालय बांस से बना था,जिसकी मरम्मत वहाँ के छात्र छात्राएँ खुद करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;बाद में हम लोगों को गिरीश कर्नाड,अश्विनी मिश्र,कमलेश्वर,वसंत कानिटकर जैसे कथाकारों नाटककारों से मिलने और बात करने का मौका मिला। मुझे ये अवसर डहरिया सर के थप्पड़ की वजह से नसीब हुआ था, पर मैं अभी भी घमंड में चूर था। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;वहाँ से लौटकर मैंने संगीत कक्ष में जाना पूरी तरह से बंद कर दिया। डहरिया सर से मैंने फिर कभी ज्यादा बात नहीं की।९ वी में मेरा रुझान खेल की तरफ हो गया, और खेल के मैदान में घुसने के बाद तो संगीत और मंच से नाता टूट ही जाता है। गणित से तो मुझे एलर्जी थी,इसलिए मुझे १०वी कक्षा में कम्पार्टमेंट आ गयी।जैसे तैसे कम्पार्टमेंट पास करने के बाद भी जब मेरे विज्ञान और गणित के कुल अंक ११० नहीं हो पाए तो नियमानुसार मुझे ११वी में कॉमर्स ही मिल सकता था। मुझे विज्ञान चाहिऐ था इसलिए मैंने नवोदय छोडा और एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल में जीव विज्ञान लेके पढ़ने लगा। इस स्कूल में आके भाषा का क्षरण हो गया, भाषा पर से पूरी पकड़ चली गयी। अब सब कुछ हिंगलिश हो गया, और संगीत के नाम पर कैरोल्स और इंग्लिश प्रेयर्स ही रह गयीं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;हर किसी के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं,जब अतीत को देखकर आप मुस्कुराते भी हैं और झेंप भी होती है।अब लगता है कि ऐंठ ही ऐंठ में कितने सुनहरे अवसर खो दिए। नवोदय विद्यालय में पढ़के मैं क्या नहीं सीख सकता था? वैसे प्यार करने वाले शिक्षक अब कहाँ मिलेंगे? जब मिले थे तब कद्र नहीं की। वो क्या था? क्या वो बचपना था? जब आप सोच लेते हैं कि आपने सबकुछ पा लिया उस क्षण से ही आपका पतन प्रारंभ होता है।जब तक आप समझ पाते हैं, तब तक बहुत कुछ खो चुके होते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;खैर,,, अब मैं कोशिश करता हूँ कि मैं घमंडी न बनूँ। एक बार घमंड करके बहुत कुछ खोया है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अभी दो साल पहले डहरिया सर से मुलाकात हुई।  एन सी सी कैम्प में नवोदय की टीम लेकर आये थे। मैंने जाकर उनके पैर छुए तो वो पहचान नहीं पाए, फिर जब उन्होने पहचानने की कोशिश करते हुए कहा कि "क्या तुम शिशिर उइके के बैच के हो",कितनी ख़ुशी हुई कह नहीं सकता,सोचकर कि चलो मेरा बैच आज भी मेरे नाम से याद रखा जाता है।  मैंने उनको सारी बातें कहकर दिल का बोझ हल्का किया।उन्होने भी मुझे स्कूल के हालचाल बताये( जो कि अब खराब हो चुके हैं)। आप लोग भी अपने पुराने शिक्षकों,मित्रों और चाहने वालों  से मिलकर दिल का बोझ हल्का करलें। सीखने का कोई मौका न छोडें क्योंकि क्या पता वो मौका दुबारा मिले या न मिले।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-1832380585819276081?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/1832380585819276081/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=1832380585819276081' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/1832380585819276081'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/1832380585819276081'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/02/blog-post_03.html' title='डहरिया सर का थप्पड़'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-425661733428043527</id><published>2008-02-02T01:31:00.000-08:00</published><updated>2008-02-02T23:47:09.190-08:00</updated><title type='text'>राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट ।</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;भारतीय राजनीति में महात्मा गाँधी के बाद अगर सबसे ज्यादा कोई नाम बिका है तो वो है "राम". राम नाम पतंग है। हर राजनीतिक दल की पतंग अलग है। हर राजनीतिक दल अलग तरीके से पेंच लडाता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;बीजेपी इस पतंगबाजी का सबसे पुराना खिलाडी है, गुजरे वक़्त में उसने माँझे की धार और तेज कर ली है। राम नाम का उपयोग कमाने और डराने में कैसे किया जाता है, ये बीजेपी से ज्यादा बेहतर और कोई राजनीतिक दल नहीं जानता।बाबरी मस्जिद को ढहाए १६ साल हो गए,पर अभी तक राममंदिर नहीं बना।हालांकि बीजेपी नेताओं के घर लक्ष्मी की खासी कृपा हो गयी,बच्चे विदेश पढ़ने चले गए, पूरे देश ने देखा कि बीजेपी को कितना चन्दा मिलता है, पार्टी मीटिंग पांच सितारा होटलों में होने लगी,फीलगुड के विज्ञापन पर अरबों खर्च दिए पर राम मंदिर बनाने को पैसे नहीं जुडे। वैसे गुजरात चुनाव के बाद बीजेपी ने पुराने मुद्दों को भूलकर अपनी एक नयी छवि पेश करने का प्रयास किया है। रामजन्मभूमि को त्यागकर रामसेतु पर ध्यान केन्द्रित किया है।राम मुद्दा भी है, और समाधान भी।बार बार वोट मांगने के लिए मुद्दे का रहना आवश्यक है। राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए अयोध्या का चूल्हा और सेतुसमुद्रम का तवा बहुत जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो बहन जी पीछे नहीं रह गयी हैं। सुना है अमीनाबाद में बहन जी के कार्यकर्ता "सच्ची रामायण" बंटवा रही हैं। मायावती का पेरियार प्रेम देखकर कांग्रेस और बीजेपी अब एक ही मंच पर आ गए हैं, और उन्होने खुलकर मायावती के कृत्य का विरोध करना प्रारंभ कर दिया है। करात को डर लग रहा होगा कि कहीं कांग्रेस और बीजेपी साथ मिलकर तीसरे मोर्चे कि हवा न निकाल दें।बहन जी का विरोध करके कांग्रेस तो एफिडेविट केस से उबरने का प्रयास कर रही है, और बीजेपी इसे सीडी केस के तोड़ की तरह देखने का प्रयास कर रही है। बहन जी गलती भी तो करती हैं, नागनाथ सांपनाथ को एकसाथ ललकारेंगी तो यही तो होगा ना। किसी न किसी का विष तो काम कर ही जाएगा। वैसे अमीनाबाद में "सच्ची रामायण" बांटे जाने से बहन जी की सामाजिक अभियांत्रिकी की असलियत दिख रही है।इससे कहीं उनके प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब में पलीता न लग जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी सुना था कि रामराज्य में शेर और बकरी एक ही घाट का पानी पीते थे। इसमे नयी बात कौन सी है,अभी भी पीते हैं,एक ही घाट से पीते हैं पर अलग अलग समय पर।कल कोई कह रहा था कि देशमुख सरकार में रामराज्य है। मैंने पूछा क्यों?तो जवाब मिला कि वहाँ शिवसेना वाले और यूपी,बिहार के लोग एक ही नलके का पानी वापरते हैं. तो आजकल रामराज्य का मतलब ये हो गया है।लोग थोडे में ही खुश रहें यही आज का रामराज्य है।मुम्बई में आयोजित यूपी महोत्सव में भोजपुरी नायिकाओं के ठुमके लगाने से यूपी,बिहार वालों के मन का भय समाप्त हो जाएगा,ऐसा शिवसेना वालों का मानना है। ये शिवसेना की रामराज्य की परिभाषा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;ये सारी परिभाषाएं महात्मा गाँधी द्वारा कल्पित रामराज्य से कितनी भिन्न हैं।क्या इसमे कहीं भी सबको रोटी,सबको कपडा,सबको मकान वाली सोच है?नहीं है ना। इसमे "सबको" की जगह "हमको" वाला भाव प्रबल है।जनता की प्राथमिक आवश्यकताएं आप मंदिर मस्जिद बनाकर पूरी नहीं कर सकते।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;em&gt;"पेट की भूख को घुटनों से दबा कर बैठा हूँ&lt;br /&gt;ये ना समझो कि सजदे में हूँ।"&lt;/em&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;राजनीतिक दलों ने सालों तक गांधी और राम को बेचने का काम किया,पर समझने की कोशिश कभी नहीं की।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;लिखते लिखते काफी सीरियस बातें लिख गया,ऐसा अक्सर होता नहीं है।मन और माहौल हल्का करने के लिए अब एक चुटकुला सुनाता हूँ:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;बचपन के दिन याद आते हैं, जब बाबरी विध्वंस हुआ था तो उसके बाद कारसेवक ट्रेनों में भर भर के मुफ्त यात्राओं का मजा उड़ा रहे थे।हम लोग ट्रेन से नाना नानी के घर जा रहे थे। इलाहाबाद इटारसी पैसेंजर में पिताजी ने एक कारसेवक से पूछ लिया कि ये तुम लोग थैले में क्या ईंटे भरके ला रहे हो ,उसने कहा कि ये ऐसी वैसी ईंटें नहीं,बाबरी मस्जिद की ईंटें हैं।पिताजी ने कौतुहूलवश उससे ईंटें देखने के लिए मांगी,उसके बाद वे जोर से हँसे और खूब देर तक हँसते रहे। वो लाल मिटटी की बनी एकदम ताज़ी ईंटें थीं, उन ईंटों पर अंग्रेजी में "BABRI" लिखा हुआ था, और कटनी स्टेशन पर किसी सिन्धी ने उन कारसेवकों को वो ईंटें २००-२०० रुपये में बेच दी थीं। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-425661733428043527?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/425661733428043527/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=425661733428043527' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/425661733428043527'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/425661733428043527'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/02/blog-post_02.html' title='राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट ।'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-4423754003759691828</id><published>2008-02-01T22:29:00.000-08:00</published><updated>2008-02-02T01:17:12.337-08:00</updated><title type='text'>आओ तुम्हे झुग्गी  में ले जाऊं !</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R6Qs3Qnnb_I/AAAAAAAAAEo/LLiqjhr16HY/s1600-h/20040301093810dharavi_mumbai203.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5162300400738988018" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R6Qs3Qnnb_I/AAAAAAAAAEo/LLiqjhr16HY/s200/20040301093810dharavi_mumbai203.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt; &lt;span class=""&gt;पिन&lt;/span&gt; से लेकर प्लेन तक,औरत की आबरू से लेकर देश की इज्जत तक, भारत में सब बिकाऊ है।भारत को दुनिया का उभरता बिग बाज़ार ऐसे ही नहीं कहते।आजकल इस बाज़ार ने एक नया माल उतारा है "गरीबी"।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ५०० एकड़ से भी ज्यादा विस्तृत क्षेत्र में फैला धारावी एशिया के सबसे बडे स्लम (झुग्गी बस्ती) के रुप में जाना जाता है आज भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है।दुनिया भर के पर्यटक यहाँ के रहन सहन का अध्ययन करने आते हैं। &lt;span class=""&gt;धारावी &lt;/span&gt;में आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या कभी कभी गोआ कार्निवाल और खजुराहो के मंदिर देखने वालों को भी पार कर जाती है।क्या इसका ये मतलब निकाला जाये कि बीते सालों में विदेशियों की अभिरुचियों में बदलाव आये हैं और अब उन्हें सागरतटों और सेक्स से विरक्ति हो चली है? या फिर वे खुद को ये समझाने आते हैं कि "देखो दुनिया कितनी गरीब है,फटेहाल है,ऊपरवाले का शुक्र है कि हम ऐसे नहीं हैं"। मुझे तो ये भी समझ नहीं आ रहा कि इसे महाराष्ट्र पर्यटन मंत्रालय की उपलब्धि समझा जाए या बेशर्मी।सुना है प्राइवेट टूरिज्म कंपनियों के टूरिस्ट पैकेज में स्लम टूर भी शामिल किया जाने लगा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R6QwoAnncBI/AAAAAAAAAE4/n7Wr_otCFUA/s1600-h/20040301093909slums203.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5162304536792494098" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 218px; CURSOR: hand; HEIGHT: 159px" height="176" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R6QwoAnncBI/AAAAAAAAAE4/n7Wr_otCFUA/s200/20040301093909slums203.jpg" width="200" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;चुनाव के आते ही धारावी के कायाकल्प की बातें सुनाई देती हैं,सौ से लेकर हजार करोड़ तक की बातें होती हैं।अचानक ही सब राजनेता "मी मुम्बईकर" हो जाते हैं।चुनाव के समय विरार-धारावी विरार-धारावी,और चुनाव के बाद जुहू-बांद्रा जुहू-बांद्रा हो जाते हैं। चुनाव जीतते ही धारावी आँखों में दिखाई नहीं पड़ती।सावन का अँधा हरा देखता है,मुम्बई के अंधे बालीवुड की चमक देखते हैं।एक राजनेता कहते हैं "कौन कहता है धारावी गरीब है,४५ अरब रुपये का सालाना व्यापार करता है धारावी।"जी सरकार,आप जैसा कहो मालिक। हम तो सुनने के लिए बैठे हैं,आपको चुनने के लिए बैठे हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;वैसे हर विदेशी सैलानी भारत की खिल्ली उडाने के इरादे से धारावी जाता हो, ऐसा भी नहीं है।कुछ लोग वहाँ जाकर अच्छा काम करते हैं।कुछ लोग हर साल वहाँ के स्कूलों के लिए चन्दा इकठ्ठा करके आते हैं।विदेशी एन जी ओ धारावी के कारीगरों की मदद के लिए हमेशा आगे आते रहते हैं।पर देशी राजनेता वहाँ फटकते भी नहीं.कभी कभी तो शक होता है कि असली मुम्बईकर कौन है?  &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;खैर ऋतिक रोशन के घर में मटमैला पानी आने की खबर के बाद से इस समय तक, मुम्बई महानगरपालिका का अमला उनके घर के पानी की पाइपलाइन सुधारने में तत्परता से जुटा हुआ है, क्योंकि हर नागरिक को साफ पीने का पानी दिलाना उनका कर्तव्य है।उधर धारावी में एक जर्मन छात्रों का दल खुद से बनाए हुए सस्ते वाटर फिल्टर बाँट रहे हैं, ताकि वहाँ दूषित पानी से होने वाली बीमारियों पर काबू पाया जा सके।&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-4423754003759691828?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/4423754003759691828/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=4423754003759691828' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/4423754003759691828'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/4423754003759691828'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='आओ तुम्हे झुग्गी  में ले जाऊं !'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R6Qs3Qnnb_I/AAAAAAAAAEo/LLiqjhr16HY/s72-c/20040301093810dharavi_mumbai203.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-8650252557709263112</id><published>2008-01-31T07:10:00.000-08:00</published><updated>2008-02-02T04:51:06.181-08:00</updated><title type='text'>सरनेम(उपनाम) की उत्पत्ति और विकास का सिद्धांत</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;जब देखता हूँ कि आज हर जगह सरनेम का लफडा है, तो कभी कभी सोचता हूँ कि सरनेम की शुरुआत कैसे हुई होगी। ज्यादा दूर न जाके भारत मे सरनेम की उत्पत्ति पर विचार करते हैं।( अब कोई ये न समझे कि भारत सॉफ्ट टार्गेट है, या भारतीय सहिष्णु होते हैं इसलिए मैं भारत की बात कर रहा हूँ।मैं भारत की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मैं भारत के बाहर कभी गया ही नहीं। और ये बताएं कि सरनेम की उत्पत्ति पर विचार करने के लिए भारत से अच्छा अध्ययन स्थान कोई और हो सकता है। ऐसी "सर्नेमिक विविधता" वाला देश हमे कहाँ मिलेगा बताइए। इसलिए मेरी बात को अन्यथा न लें, और अगर ले रहे हों तो भाड़ मे जाएँ। )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;चलिए कोष्टक मे जो भी लिखा है वो सारी कूटनीतिक बात को पीछे छोड़ कर आते हैं मुद्दे पर, और बात करते हैं सरनेम की। मैंने कुछ कथित रुप से विद्वान टाईप बुजुर्गों से इस बारे मे कभी पूछा था। सबने अलग अलग बात बताई। उनकी बकवास का और मेरे विचार मंथन का जो भी लब्बो-लुआब निकल कर आया वो कुछ इस तरह का था :-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;पाषाणकाल मे सरनेम का कोई महत्व नहीं रहा होगा। क्योंकि उस काल मे सारे काम लोग मिलजुल कर करते थे।कबीले के नौजवान शिकार करते थे,औरतें कपडे सिलने, खाना पकाने के अलावा कढाई बुनाई की क्लास ज्वाइन करती रही होंगी, और बुजुर्ग प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते हुए टिक्के और कबाब का आनंद लेते रहे होंगे या आपस मे मिलकर गपशप किया करते होंगे।हर कोई मांसाहारी था, हर कोई चमार था हर कोई बन्सोड था, इसलिए छुआछुत वाली कोई बात ही नहीं रही होगी।उस समय अगर सरनेम रहे भी होंगे तो शायद ऐसे रहे होंगे-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;बीमारी का बहाना बनाकर शिकार पर ना जाने वाले- कामचोर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;शिकार पर जाने के लिए हमेशा तैयार- मेहनती&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;कोई शिकार करके लाये फिर भी न खा पायें- अलाल &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;शिकार कोई और लाये और ये खा जाएं- शिकारचोर या हरामखोर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;पत्ते पहनने वाले- पत्राम्बर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;चमड़ा पहनने वाले-चम्राम्बर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;पत्ते से पोंछने वाले-पत्रपोंछे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;पानी से धोने वाले- पणधुले&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सूअर का शिकार करने वाला-सूअरमारे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;हाथी का शिकार करने वाला- हाथिमार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;कहने का मतलब यह है कि जो जैसा काम करता रहा उसे वैसा ही उपनाम मिलता रहा। अब धीरे धीरे ये उपनाम या सरनेम वंशानुगत होते गए होंगे. इनके वंशानुगत होने में भी मनुष्य के स्वभाव ने ही अहम् भूमिका निभाई होगी.उदाहरण के तौर पर जैसे कबीले के सरदार ने किसी एक हाथी के शिकारी युवक को एक भेड़,पत्थर का भाला और हाथीमार की उपाधि ईनाम में दी होगी,वो अचानक ही "कबाईलीयन ऑफ़ दी ईयर" बन गया होगा और कबीले की सुंदरियों की निगाह में चढ़ गया होगा.ये सब देखकर उसके साथी जल मरे होंगे. रात में मदिरापान के समय किसी जब उसने गर्व से वो भाला अपने साथियों को दिखाया होगा तो किसी ने जलनखोरी में चिढ़कर उसे कह दिया होगा कि "चल बे, ये भाला हमें न दिखा, हमें तेरे पूरे खानदान का पता है, तेरा परदादा मुर्गिमार था,तेरा दादा सूअरमार था,तेरा बाप भी सूअरमार था. तू चाहे कितने भी हाथी मार ले, रहेगा तो तू सूअर मार की औलाद ही ना।" बस ऎसी ही कुछ घटनाओं से सरनेम वंशानुगत हो गए होंगे,कुछ जलनखोरों ने मिलकर पूरा इतिहास बदल दिया होगा।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अब हरित क्रांति का दौर आया,रोजगार बढ़ गए और साथ ही कामों की विविधता भी बढ़ गयी।कोई बेरोजगार न रह गया।  कबीले अब गाँव बन गए होंगे।  अब गाँव का नाम भी लोगों की पहचान बन गया होगा. नाम,बाप का नाम के साथ एक और सवाल जुड़ गया होगा गाँव का नाम. लोग हर अनजाने से पूछते होंगे "कौन हो भाई,कौन गाँव से आये हो?"अब हर कोई तो इतना सहनशील नहीं होता कि बार बार नाम बताये फिर गाँव का नाम बताये. तो कुछ लोगों का दिमाग खराब हुआ और उन लोगों ने अपने गाँव के नाम अपने सरनेम बना लिए. साहिर लुधियानवी और हसरत जयपुरी उन्हीं में से रहे होंगे. अब नाम पते की चिकल्लस ख़त्म हो गयी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;हरित क्रांति के बाद गाँवों का आर्थिक विकास हुआ,जो काम धंधा करते रहे वो कभी गाँव के तो कभी काम के नाम से पहचाने जाते रहे होंगे।समाज दो वर्गों में बाँट गया होगा; मेहनत करके खाने कमाने वाले और बैठ कर रोटियाँ तोड़ने वाले. खाने को बहुत था इसलिए एक वर्ग मेहनत करना ही नहीं चाहता था.अब एक बड़ी दुविधा उत्पन्न हो गयी थी. मेहनत करने वाले तो अपने काम के नाम से पहचाने जाते थे पर निठल्लों का क्या उपनाम हो? ये एक बड़ी परेशानी का सबब बन गया. पंचायत बैठी, किसी ने सुझाया कि इन निठल्लों को इनके बाप का नाम दो. पर किसी ने आपत्ति जताते हुए कहा कि उनका क्या जिनके पिता ने उन्हें निठल्लेपन के कारण अपनी संतान मानने से इनकार कर दिया है?बड़ी समस्या थी. सरपंच ने फैसला सुनाया कि या तो ये निठल्ले कोई काम अपना लें या फिर गाँव छोड़कर चले जाएं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;निठल्लों को दूसरा रास्ता अच्छा लगा. वे गाँव से निकल कर जंगलों में चले गए और शिकार करना तो आता नहीं था इसलिए कंदमूल खाकर अपना जीवयापन करने लगे।  कोई दोहा गढ़ता तो कोई चौपाईयाँ सुनाता।उनका एक ही मंत्र था&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;em&gt;"अजगर करे न चाकरी,पंछी करे न काम&lt;br /&gt;जंगल में कंदमूल भरा पड़ा है,खाओ सुबह शाम"&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;कुछ निठल्लों सोचना शुरू किया क्योंकि उनके पास समय बहुत था।कुछ ने जमीन पर लकीरें खींचना शुरू किया,इन निठल्लों ने भाषा,गणित और पता नहीं क्या क्या फालतू चीजों की खोज की. अपनी सोच को इन्होने पत्तों में लिखना शुरू किया,और अपने बच्चों को सिखाने लगे। निठल्लों ने खाली समय में हस्तलिखित पत्तों के भण्डार जमा कर लिए जिन्हें वो पोथी कहने लगे। निठल्लों के सरनेम अब पोथी निर्दिष्ट हो गए थे। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;उदाहरण- एक पोथी रटने वाला-पोथी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;दो पोथी रटने वाला-द्विपोथी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;तीन पोथी रटने वाला-त्रिपोथी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;चार पोथी रटने वाला-चतुर्पोथी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जो पोथी न रट पाए, वे अपने बाप का नाम उपनाम की जगह लगाते गए होंगे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;खैर, बाहर की दुनिया बदल रही थी,गाँव अब शहर बन चुके होंगे और सामंतवाद चरम पर पहुँच गया होगा. पंचायती राज ख़त्म हो गया था और प्रशासन केंद्रीकृत होकर एक व्यक्ति के हाथ में चला गया था जिसे राजा कहते थे।  लोगों के पास अफरात माल जमा हो गया था पर दिन भर मेहनत करते रहने के कारण मन की शांति नहीं रही होगी. चारों तरफ अशांति का बोलबाला हो गया. राज दरबार में भी अशांति थी, क्योंकि ऊटपटांग खाते रहने के कारण रानियों को अपच की बीमारी हो गयी थी. राजमहल भी महामारियों का जन्मस्थान बन गया होगा। &lt;br /&gt;इधर निठल्लों का भी भोजन समाप्ति की कगार पर होगा, क्योंकि उनकी जनसंख्या काफी बढ़ चुकी थी।ऐसे में किसी निठल्ले ने सुझाया कि चलो अब जंगल से बाहर चलते हैं भिक्षा मांग कर अपना जीवन यापन करेंगे. निठल्ले ना सिर्फ बाहर निकले बल्कि उन्होने राजदरबारों में अपनी धाक भी जमा ली. पर ये सब हुआ कैसे होगा? शायद ये कुछ इस तरह हुआ होगा:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;निठल्ले बाहर आये तो उन्होने देखा की चारों ओर अफरातफरी का माहौल है।  ये देख कर निठल्लों के कलेजे में ठंड पड़ गयी होगी,कुछ दौड़ते सैनिको को देखकर एक निठल्ले ने पूछा कि "भाई क्या हुआ? कहाँ भागे जा रहे हो?"बदहवास सैनिक ने कहा कि महाराजाधिराज की पटरानी को जबरदस्त लूज़मोशन हो रहे हैं, हम ऐसे व्यक्ति को ढूँढ रहे हैं जो उन्हें इससे निजात दिला सके. उस व्यक्ति को राजमहल का विशेष अतिथि बनाकर ताउम्र रखा जायेगा।" अंधे के हाथ जैसे लग गयी बटेर,निठल्लों को जंगल में रहते रहते औषधियों का थोडा बहुत ज्ञान तो हो ही गया था, उन्होने फौरन जाकर रानी को वो औषधि दी होगी और रानी के ठीक होते ही उनकी महल में धाक जम गयी होगी।  कुछ समय बाद तो वे राजा के आधिकारिक "साले" की तरह व्यवहार करने लगे होंगे. कुछ समय बाद राजा राजकाज में भी उनकी सलाह लेने लगा होगा।  अब तो निठल्लों की हो गयी ऐश. सैय्याँ भये कोतवाल अब डर काहे का।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;निठल्ले जानते थे कि यदि उन्होने अपना ज्ञान बांटा तो उनकी पूछ ख़त्म हो जायेगी,और वे मेहनतियों के द्वारा की गयी बेइज्जती और गाँवनिकाला के बाद की पीडा को भूले नहीं थे।  इसलिए उन्होने ठान लिया कि उनका ज्ञान किसी को नहीं मिलेगा। &lt;br /&gt;अब समाज चार वर्गों में बाँट गया था:&lt;br /&gt;सबसे ऊपर का वर्ग था निठल्लों का&lt;br /&gt;फिर निठल्लों के रक्षक जिसमे राजा और सैनिक शामिल थे.&lt;br /&gt;फिर निठल्लों के अधीन व्यापारी,सप्लायर्स।&lt;br /&gt;और अन्तिम वर्ग था मेहनतियों का। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब से लेकर आजतक सरनेम ज्यों के त्यों हैं। पर सरनेम अब वंशानुगत रह गए हों ये पूरी तरह से सच भी नहीं है।  सरनेम की वंशावली को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;(१) डर - डर सबको लगता है,फूलनदेवी के डर से चम्बल के कितने ठाकुरों ने सरनेम बदल लिए। ठाकुरों के डर से कितनी फूलनदेवीयों ने अपने सरनेम बदल लिए. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;(२) दंगे फसाद - दंगे फसादों में अच्छे अच्छों के सरनेम बदल जाते हैं,दंगे फसादों में सरनेम बदलकर लोग आपसी प्रेम का प्रदर्शन करते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;(3) क्रांतियाँ - जब समुद्र की तलहटी में ज्वालामुखी फटता है, तो समुद्र तल के पानी का भी रंग बदल जाता है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;(४)स्वार्थ - कई लोग स्वार्थ में सरनेम बदल लेते हैं।उदाहरण के तौर पर- नौकरी लगने तक गोंड थे,नौकरी लगने के बाद गौड़ हुए और राजनीति में आने मिला तो गौर हो गए.कुछ लोग फर्जी जाती प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सरनेम बदल लेते हैं।  &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;(५)आत्मविश्वास की कमी - इस कारण से सरनेम बदलने के तो लाखों उदाहरण मिलते हैं, लोग तो अपने सहकर्मी, सहपाठियों से भी असली सरनेम छुपा जाते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;(६)लालच - कई बार जब दूसरे व्यक्ति से काम निकलवाना होता है, तब हम उसका सरनेम परिवर्तित करके उसे बराबरी का एहसास दिलाते हैं।उदाहरण - मध्यप्रदेश में जूते सिलवाते वक़्त चर्मकार को "चौधरी जी" कहकर संबोधित किया जाता है. खेतिहर मजदूर आदिवासियों को खेत में काम करवाते वक़्त "ठाकुर साहब" कहने का भी प्रचलन यहाँ पर है. ये अलग बात है कि जब पैसा देने की बारी आती है, तो "ठाकुर साहब" और "चौधरी जी" को उनके असली उपनामों से पुकारकर उनकी असली औकात भी याद दिला दी जाती है।( ये मध्यप्रदेश का ट्रेड सीक्रेट है)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सरनेम में पदोन्नति या सर्नेम्मोनती जैसा कोई प्रावधान नहीं है। "सरनेम सुधार आन्दोलन" जैसा कोई आन्दोलन भी अभी तक अस्तित्व नहीं ले सका है, ये शायद इसलिए, क्योंकि एक का "सरनेम सुधार आन्दोलन" दूसरे को "सरनेम बिगाड़ आन्दोलन" प्रतीत हो सकता है।हालांकि बीच में कुछ हड़ताली डॉक्टरों ने सुझाव दिया था कि सबका सरनेम एक कर दिया जाए।  आजकल के डॉक्टरों से ऐसे ही बेवकूफाना सुझावों की उम्मीद रहती है।  अरे,,, "सबका मालिक एक" नहीं हो पाया अब तक, सबका सरनेम कहाँ से एक हो जायेगा।&lt;/span&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-8650252557709263112?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/8650252557709263112/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=8650252557709263112' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/8650252557709263112'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/8650252557709263112'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/01/blog-post_31.html' title='सरनेम(उपनाम) की उत्पत्ति और विकास का सिद्धांत'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-640672595824972847</id><published>2008-01-30T03:23:00.000-08:00</published><updated>2008-01-30T09:12:23.470-08:00</updated><title type='text'>कौन कहता है कि भारतीय नस्लवादी नहीं होते?</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सबसे पहले तो आजादी के ५० साल बाद नस्लवाद शब्द को भारत मे प्रसिद्ध करने के लिए सायमंड्स और हरभजन का कोटि कोटि धन्यवाद। सायमंड्स हरभजन पर आरोप लगा कर उसे मनमाफिक सजा तो ना दिलवा पाए , पर एक बढिया काम जरूर किया है कि आम भारतीय को आईने मे झाँककर ये पूछने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम नस्लवादी हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मैंने आईने से तो नहीं पर एक मित्र से पूछा कि क्या हम नस्लवादी हैं??उसने कहा "चल बे, सायमंड्स अपन से ज्यादा गोरा है यही नहीं वो तो फिरोज खान के बच्चों और बाराबंकी महिला महाविद्यालय की मालकिन से भी ज्यादा गोरा है, हम उसपे क्या ख़ाक टिपण्णी करेंगे ।"पर सवाल तो ये उठता है कि क्या एक काला आदमी एक अपेक्षाकृत गोरे व्यक्ति पर टिपण्णी नहीं कर सकता? मुझे तो लगता है कि कर सकता है। काले लोगों का ग्रुप बनाओ और रोज एक गोरे आदमी को पकड़ कर खूब चिढाओ, आप उससे उसके रंग का कारण पूछो, उसके खानदान तक पहुंच जाओ। न सातवे दिन वो पुलिस मे रिपोर्ट कर दे तो नाम बदल देना।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;भारत मे सदियों से गोरे रंग को स्टेटस सिम्बल माना जाता रहा, आर्य द्रविड़ का खेल तो सबको याद ही होगा।हजारों साल तक ये नाटक चलता रहा।पर परेशानी तो तब हो गयी जब २०० साल पहले हमसे भी ज्यादा गोरे लोगों ने इस धरती पर कदम रखा।जब हमने उनका गौरवर्ण और कदकाठी देखी तो हम चकित रह गए। वो बिल्कुल वैसे ही थे जैसा कि धर्मग्रंथों मे लिखा था, यही नहीं हमारे कुछ बेवकूफ पूर्वज तो २०० साल तक उन्हें देवता समझ कर उनके आदेश बजाते रहे। रात दिन चेहरे पर फेयर ऎंड लवली मलने वाले, गोरी लड़कियों के ख्वाब देखने वाले, सांवली को मुँह पर रिजेक्ट करने वाले, हम लोग नस्लभेदी कैसे हो सकते हैं? हाँ रंगभेदी कहो तो बात अलग है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;भारत मे तो लोग बस प्यार करना जानते हैं, और प्यार दिखाने में हम लोग कभी झिझकते नहीं,हमारा प्यार कुछ कुछ साल बाद अचानक बहुत ज्यादा उमड़ता है ।और इतना उमड़ता है कि दिल्ली से भागलपुर तक,गुवाहाटी से गोधरा तक लोग उस प्यार को महसूस कर पाते हैं। अब हमारे शहर को ही लीजिये, हमारे शहर में पूर्वोत्तर राज्यों से कुछ लोग आते हैं कभी पढ़ने तो कभी कुछ काम करने।अब भाई उनके लिए जाने अनजाने किसी किसी के मुँह से नेपाली या चीनी निकल जाता है।कुछ दक्षिण भारतीय लोग फैक्टरियों में नौकरी करने के लिए आते हैं तो लोग उन्हें प्यार से करिया,कलूटा,कलवा,कल्बिलवा,कालू कह देते हैं। अब भारत के लोग हैं, तो ये सारे नाम प्यार से ही देते होंगे ना।अब अगर इससे भी कोई नाराज हो जाये, तो वो जाने उसका काम जाने।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अच्छा ये बताओ कि पंजाबियों का दिमाग घुटने में होता है, मराठी कंजूस होते हैं, बंगाली डरपोक होते हैं,बिहारी गुंडे होते हैं,कश्मीरी आतंकवादी होते हैं। ये सब क्या है? अरे पगले इंसान ये तो क्षेत्रवाद है,अजीब पागल हो यार!हर चीज को नस्लवाद बोलते हो!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;भारतीय आपस मे ही इतना प्यार करते हैं कि क्या बताएं। कुएँ से पानी भर लेने पर जहाँ नीची जाति वालों की औरतों बेटियों का सामुहिक बलात्कार कर दिया जाता है, मंदिर मे प्रवेश करने जहाँ गाँव के गाँव जला दिए जाते हैं उस देश को आप जातिवादी कहलो भाई पर आप तो नस्लवादी का तमगा दे रहे हो वो तो सरासर गलत है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;हमारे देश मे लड़कियों को दहेज़ के लिए जिंदा जलाया जाता है, कितनों का बलात्कार तो जान पहचान वाले और रिश्तेदार ही कर डालते हैं, लड़की को या तो गर्भ मे मार दिया जाता है और अगर कहीं धोखे से पैदा हो गयी तो कुत्तों को खिलाने के लिए झाडी मे फेंक देते हैं। हाँ तो मान रहे हैं ना, कि ये सब होता है। हमने इस बात को मानने से कभी इनकार किया क्या?हम तो सीना ठोंक कर कहते हैं कि हाँ हम लिंगभेदी हैं ,कम से कम दूसरों की तरह नस्लभेदी तो नहीं हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सायमंड्स मुझसे कह रहे थे कि उन्हें बिग मंकी कहलाना पसंद नहीं। मैनें उनसे कहा कि बंधू आप तो इतने मे ही गुस्सा हो गए, डार्विन को तो पोप ने बन्दर घोषित कर दिया था। हरभजन ने आपको बड़ा बन्दर कहा था तो आप उसे छोटा बन्दर कह देते, उच्छल कूद तो वो भी मचाता है । सायमंड्स बोले कि हाँ मैं तो यही बोलना चाहता था, पर पोंटिंग ने कहा कि "साले अपनी तो भद्द पिटवाओगे और साथ मे मेरी भी,तुम तो हो ही वेस्टइंडीज की पैदाईश और वो इंडिया का, तुम दोनो तो बन्दर ही हो, पर कल तुम्हारे चक्कर मे मुझे कोई मंझला बन्दर बोलने लगा तो?" इस कारण मुझे शिक़ायत करनी पड़ी। खैर मैंने सायमंड्स को समझा दिया है कि भारतीय रंगभेदी हो सकते हैं,क्षेत्रवादी हो सकते हैं , जातिवादी हो सकते हैं, लिंगभेदी हो सकते हैं पर नस्लभेदी,,,,कभी नहीं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;ऐसा जवाब दिया सायमंड्स को कि वो मुझे देखता ही रह गया।फिर उठा और फिर, ऐसा कुछ बोला "ब्लडी रेसिस्ट इंडियन",मुझे पता था कि वो मेरी तारीफ करके गया है,मेरा सीना गर्व से फूल कर हेडन जैसा हो गया।पढ़ने वालों से अनुरोध है कि नयी बनियान जरूर ले लें। &lt;/span&gt;  &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-640672595824972847?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/640672595824972847/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=640672595824972847' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/640672595824972847'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/640672595824972847'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/01/blog-post_30.html' title='कौन कहता है कि भारतीय नस्लवादी नहीं होते?'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-5064485965305802845</id><published>2008-01-28T05:43:00.000-08:00</published><updated>2008-01-29T06:53:57.702-08:00</updated><title type='text'>भारतीय शिक्षा - उद्यम या उद्योग</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R53edwnnb-I/AAAAAAAAAEg/MvTl9G7ywrE/s1600-h/boys01%5B1%5D.JPG"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5160525350885093346" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R53edwnnb-I/AAAAAAAAAEg/MvTl9G7ywrE/s200/boys01%5B1%5D.JPG" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;विचार&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt; का दीपक बुझ जाने पर चरित्र अँधा हो जाता है। अच्छी शिक्षा मनुष्य मे अच्छे विचार पैदा करती है।  &lt;span class=""&gt;शिक्षा&lt;/span&gt; का ध्येय ही चरित्र निर्माण होता है।मनुष्य की आंतरिक सुन्दरता को सिर्फ और सिर्फ अच्छी शिक्षा से उजागर किया जा सकता है।अच्छी शिक्षा व्यवस्था किसी भी राष्ट्र के विकास की रीढ़ होती है। संसाधनों की उपलब्धता,प्रतिव्यक्ति आय या रहन सहन से किसी भी राष्ट्र के विकास का मापन संभव नहीं है जब तक कि इसमे चिकित्सा और शिक्षा जैसे मूलभूत तत्वों को शामिल न किया जाये।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt; "भारत प्राचीन काल से ही ज्ञान की धरती माना जाता रहा है। नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों मे विश्व भर के प्रबुद्ध छात्र अपने ज्ञान को निखारने के लिए आते रहे।भारत ने विश्व &lt;span class=""&gt;को&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 281px; CURSOR: hand; HEIGHT: 186px" height="149" alt="" src="http://www.crossroads.org.hk/nav_root/images/india" border="0" /&gt;&lt;/span&gt; समय समय पर चोटी के विद्वान् दिए।"ये सब अब पुरानी बातें हो गयी हैं। ये " दिल को बहलाने के लिए ख़याल अच्छा है गालिब" वाली बातें हैं।भारत की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था बुरी तरह से बीमारू हालत मे है,और यही सच है। भले ही ये कितना ही कड़वा क्यों न हो।  कब तक मैं और आप चरक,चाणक्य,आर्यभट्ट का नाम गा गाकर खुद को बेवकूफ बनाते रहेंगे। सच्चाई हम सब जानते हैं, ये अलग बात है कि हम आत्मसंतुष्टि के लिए आँखें मूँद कर पूर्वजों के ज्ञान का गुणगान करते रहते हैं और भविष्य की पीढ़ी के साथ हो रहे खिलवाड़ से अनजान बने रहते हैं।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://www.indiaedunews.net/newsimages/Child%20education1.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://www.indiaedunews.net/newsimages/Child%20education1.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 112px; CURSOR: hand; HEIGHT: 103px" height="114" alt="" src="http://www.indiaedunews.net/newsimages/Child%20education1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;"रटंत ज्ञान" की परम्परा तो हमारे देश मे सदियों से रही है। यही सदियों तक "पांडित्य" या "विद्वत्ता" की परिभाषा बनी रही। ये तब तक तो ठीक था जब तक हम घर से बाहर नहीं निकलते थे, श्लोकों सूक्तियों को रटकर फूले नहीं समाते थे , और उथले ज्ञान मे गौरव महसूस करते रहे। पर आज हमारी प्रतियोगिता सारे विश्व से है, और ज्ञानवान होने की ग़लतफ़हमी हमे भारी पड़ सकती है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;भारत मे सरकारों ने भी शिक्षा को हमेशा नजरअंदाज किया है।तमाम लंबे चौड़े दावों के बावजूद न तो इसे सर्वसुलभ बना पाए हैं और न ही इसे मानवीय स्पर्श दे पाए हैं।पिछले दिनों नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन के एक सर्वेक्षण में यह पता चला कि इस देश के ४२ हजार स्कूल ऐसे भी हैं, जिनका अपना कोई भवन ही नहीं है। जब बैठने तक के लिए भवन नहीं हैं तो सीखने-सिखाने के अन्य उपकरणों और शेष शैक्षिक प्रक्रियाओं की बात करना ही बेमानी है।अमेरिका मे कुल बजट का १९.९  %, जापान मे १९.६%, इंग्लैंड मे १३.९% शिक्षा पर खर्च किया जाता है।  अफसोसजनक है कि भारत मे शिक्षा पर बजट का मात्र ६ प्रतिशत भाग खर्च किया जाता है, और खुद को भविष्य की महाशक्ति कहा जाता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt; राज्य सरकारों के पास तो शिक्षकों को वेतन देने तक के लिए पैसा नहीं निकलता, ये दीगर बात है की फीलगुड जैसे राजनीतिक प्रचारों मे अरबों रुपयों का जो चूना लगता है वो भारत के आम नागरिक की जेब से ही जाता है। शिक्षकों से पढाने के अलावा बाक़ी सभी काम लिए जाते हैं, फिर वो चुनाव ड्यूटी हो या पल्स पोलियो।शिक्षक को शिक्षाकर्मी, गुरुजी और शिक्षामित्र बना कर राज्य सरकारों ने, शिक्षकों के लिए जनता के मन मे जो रहा सहा आदर भाव था वो भी ख़त्म कर दिया। हर राज्य से इन ठेके के शिक्षकों के पिटने की खबर आती रहती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्यान्ह भोजन के नाम पर भी लोग धांधली करने से नहीं हिचकते। देहातों मे मध्यान्ह भोजन मे कीडे मकोडे मिलना तो आम बात हैं, किसी किसी राज्य मे तो जैसे मध्यान्ह भोजन योजना सड़े गले अनाज के निपटारण का तरीका बन गया हो। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत मे स्कूल जाने वालों मे ४० % बच्चे अंडरवेट होते हैं, और ४२% कुपोषण के शिकार। ये आंकडे  मध्यान्ह भोजन और  आंगनबाड़ी जैसी योजनाओं की पोल खोने के लिए काफी हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;भारत में उच्च शिक्षा की हालत भी कोई ख़ास नहीं है।भारत में ९२७८ महाविद्यालय और २६० विश्वविद्यालय हैं। पर अभी भी हम उच्च शिक्षा के वांछित लक्ष्यों को प्राप्त करने में अक्षम हैं।विश्वविद्यालयों में निर्रुद्देश्य हड़ताल,कक्षाओं का बहिष्कार, शिक्षकों से दुर्व्यवहार और छात्राओं  से छेड़खानी की घटनाओं ने भारतीय उच्च शिक्षा के राजनीतिकरण के कारण बढ़ती अनुशासनहीनता का स्याह रूप दिखाया है। आधे से ज्यादा विश्वविद्यालय आर्थिक बदहाली से जूझ रहे हैं।विज्ञान और तकनीकी महाविद्यालयों में प्रायोगिक शिक्षा और शोध के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मीडिया और सरकार दोनों आईआईटी और आईआईएम् की चकाचौंध से  इतने अंधे हो गए हैं कि उनका इस बात पर बिलकुल ध्यान नहीं जाता कि क्यों देश के ६३% बच्चे १०वी कक्षा से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं, या इस बात पर कि जो शिक्षक स्कूली स्तर पर पढा रहे हैं वे उस लायक हैं भी या नहीं। आपकी नींव ही कमजोर है और आप एक उच्चवर्गीय सतही शिक्षा के विकास का ढोल पीट रहे हों तो इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;प्रतियोगी परीक्षाओं में पास कराने के नाम पर कोचिंग संस्थान अपना धंधा जिस तरह फैला रहे हैं उससे तो यही लगता है कि कुछ समय बाद इस देश में कोचिंग सेंटरों की संख्या स्कूलों और कॉलेजों से भी ज्यादा हो जायेगी।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये जो थोक के भाव प्राइवेट इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खुल रहे हैं उनकी भी सच्चाई किसी से छुपी नहीं रह गयी है।यहाँ किसी मानक का ध्यान नहीं रखा जाता। PET और PMT  में जो छात्र पास नहीं हो पाते वे यहाँ मोटी फीस चूका कर भविष्य के डॉक्टर और इंजिनियर बनते हैं। कई प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के पास तो खुद की लैब भी नहीं होती।अब ऐसे कोलेजों के कारण जो झोलाछाप डॉक्टर और कबाडी इंजीनियरों की पैदावार बढ़ी है ,उसमे कोई आश्चर्य नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचरज की बात तो ये है कि जब आरक्षण की बात आती है तो प्रतिभा का राग अलापकर देशभर में विरोध किया जाता है और पूरा देश गरीब आरक्षित श्रेणी के छात्रों की प्रतिभा पर अचानक ही शक करने लगता है, पर इन प्राइवेट कॉलेजों से निकलने वाली "तथाकथित प्रतिभाओं" पर किसी को लेशमात्र भी एतराज नहीं होता। अब इसका कारण जो भी हो,पर यह बात सोचने पर मजबूर करती है।     &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://ssa.nic.in/images/child.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 244px; CURSOR: hand; HEIGHT: 198px" height="198" alt="" src="http://ssa.nic.in/images/child.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जहाँ भारत की अर्थव्यवस्था विद्या का पलायन रोकने में अक्षम है, वहीं भारत की शिक्षा रोजगार दिलाने में। ऐसे में ये भारत सरकार की जिम्मेदारी है कि शिक्षा के क्षेत्र के ऊपर ज्यादा ध्यान दिया जाए, सीधे शब्दों में कहूँ तो ज्यादा आर्थिक ध्यान दिया जाए।राज्य सरकार भी अपना उत्तरदायित्व समझें और शिक्षकों को शिक्षक ही रहने दें, शिक्षा मजदूर (शिक्षाकर्मी) न बनाएं।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;चीनी विद्वान कंफ्युशिअस ने १००० साल पहले एक बात कही थी कि " अगर तुम १ साल आगे का सोचते हो तो चावल बोना शुरू करो, १० साल बाद के लिए सोचते हो तो पेड़ लगाओ,,अगर तुम्हारी सोच १०० साल आगे की है तो बेहतर होगा कि लोगों को शिक्षित करो।" मैं आशा करता हूँ कि ये बात सब के कानो तक पहुँचेगी और दिमाग तक भी ।   &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-5064485965305802845?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/5064485965305802845/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=5064485965305802845' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/5064485965305802845'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/5064485965305802845'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/01/blog-post_28.html' title='भारतीय शिक्षा - उद्यम या उद्योग'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R53edwnnb-I/AAAAAAAAAEg/MvTl9G7ywrE/s72-c/boys01%5B1%5D.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-9042697785490683436</id><published>2008-01-27T07:24:00.000-08:00</published><updated>2008-01-27T08:58:30.962-08:00</updated><title type='text'>दिग्विजय होने का अर्थ !</title><content type='html'>&lt;a href="http://www.dailyexcelsior.com/99aug07/digvij.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand" alt="" src="http://www.dailyexcelsior.com/99aug07/digvij.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="color:#000000;"&gt;अब इसमे क्या नया है, दिग्विजय का अर्थ तो सभी जानते हैं। पर अगर आप मध्यप्रदेश के निवासी हैं तो आपके लिए दिग्विजय शब्द के मायने ही बदल जाते हैं।मध्यप्रदेश मे दिग्विजय का मतलब होता है बिजली की कटौती, सड़कों के गहरे गड्ढे और उन गड्ढों मे कांग्रेस पार्टी की डूबी लुटिया।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;वे जलते हुए रोम के नीरो हैं, वे अंधेर नगरी के चौपट राजा हैं।उनके विरोधियों ने उन्हें एक बड़ा दिलचस्प नाम दिया था "श्रीमान बंटाधार" जो उनके कृत्यों के लिए सबसे सही संज्ञा है। मध्यप्रदेश मे अगर कांग्रेस पार्टी का कोई सबसे बड़ा दुश्मन है, तो वो हैं खुद पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह। उन्होने मध्यप्रदेश मे पार्टी का ऐसा सत्यानाश किया कि कांग्रेस के पुराने जनाधार को भी दूसरे विकल्प चुनने के लिए मजबूर होना पड़ा।  &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;दिग्विजय सिंह,लंबे समय से मध्यप्रदेश मे अर्जुन सिंह और माधव राव सिंधिया के बाद के कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता माने जाते रहे। लगातार दो बार मुख्यमंत्री बने, और ऐसे मुख्यमंत्री बने कि शायद अब मध्यप्रदेश मे अगले दस साल तक कोई कांग्रेसी मुख्यमंत्री बन ही ना पाए।और शायद इसीलिए उन्होने चार साल पहले दावा कर दिया था कि अगर विधानसभा चुनाव मे वे कांग्रेस की हार हुई तो वे अगले दस साल तक कोई पद ग्रहण नहीं करेंगे। झूठेपन की हद देखिए कि अभी ये महानुभाव कांग्रेस पार्टी का महासचिव पद लेकर बैठे हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;खैर आजकल दिग्गी राजा खासे परेशान हैं, और उनकी परेशानी का कारण हैं गुना से सांसद श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की बढ़ती लोकप्रियता। इसलिए दिग्विजय आजकल गाहे-बगाहे मध्यप्रदेश के चक्कर लगाते रहते हैं, और कई मौकों पर तो खुलकर सिंधिया के सामने आ जाते हैं।आजकल प्रदेश अध्यक्ष जमुना देवी के सामने भी उनकी ज्यादा चलती नहीं है। किसी भी रैली मे घुसकर ऐसा दिखावा करते हैं जैसे वे ही पार्टी के सबसे बडे शुभचिंतक हैं। चक्कर लगाना इनकी पुरानी आदत है, ये कांग्रेस पार्टी के राज्य चुनाव प्रभारी बन के राजस्थान,उत्तरप्रदेश,गुजरात के भी चक्कर लगा चुके हैं और जहाँ जाते हैं पार्टी की हार सुनिश्चित करके ही मध्यप्रदेश लौटते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मुझे तो ये समझ मे नहीं आता कि कांग्रेस पार्टी मे पुराने नेताओं को हाशिये पर डाल के अहमद पटेल, अम्बिका सोनी, और दिग्गी राजा जैसे लोगों को संगठन और चुनाव की जिम्मेदारी कैसे दे दी जाती है। इन जैसे लोगों के बल पर चुनाव तो नहीं जीते जा सकते बल्कि एक अच्छा खासा आत्मघाती दस्ता जरूर बनाया जा सकता है। वैसे राहुल गाँधी ताज़ी ताज़ी हार के बाद थोडे सचेत होते से दिख रहे हैं, बुंदेलखंड मे दिग्गी को किनारे कर वो खुद जाके लोगों से मिलते दिखाई दिए हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;खैर अगले साल मध्यप्रदेश मे चुनाव हैं और अगर कांग्रेस को जीतना है तो दिग्विजय जैसे नेताओं को नजरबन्द करना पड़ेगा। इतनी लंबी बकवास का सार यह है कि अगर कांग्रेस को दिग्विजय होने का अर्थ जानना है तो उन्हें दिग्विजय जैसों के "ना होने" के लिए पुख्ता इंतजाम करने पड़ेंगे।&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-9042697785490683436?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/9042697785490683436/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=9042697785490683436' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/9042697785490683436'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/9042697785490683436'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/01/blog-post_27.html' title='दिग्विजय होने का अर्थ !'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-942757353071871948</id><published>2008-01-25T00:16:00.000-08:00</published><updated>2008-01-25T08:37:03.439-08:00</updated><title type='text'>सचिन आला रे !</title><content type='html'>&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5159361341733433250" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R5m7zgnnb6I/AAAAAAAAADw/NM9EkCcO8Dg/s200/sm.bmp" border="0" /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;हमने&lt;/span&gt; वो नजारा भी देखा है जब उसके जाते ही, हमारी शटर वाली ब्लैक ऎंड व्हाइट टी वी बंद कर दी जाती थी। जिसके जाते ही, घर के बडे बुजुर्गों के माथे पर बल पड़ जाते थे और "अब कुछ नहीं हो सकता" जैसे जुमले के बाद मायूसी घर में पसर जाती थी। हमने देखा है कि घर के बुजुर्ग कैसे उसके लिए दुआएं करते थे।हम उससे कभी नहीं मिले पर वो हमेशा कोई अपना सा लगता रहा ।वो भागता रहा हम खुश होते रहे। वो शिखरों को बौना साबित करता रहा, हम उससे रोज एक नया एवरेस्ट छूते रहने की गुजारिश करते रहे।हमने उससे पर्वत मांगे थे वो हमे आसमान जीतने के भरोसे दिलाता रहा। एक समय ऐसा भी आया कि जब वो संयुक्त परिवार के उस इकलौते कमाऊ व्यक्ति की तरह हो गया जिससे सब मांगते रहते हैं पर कोई कुछ देता नहीं। अब असली इम्तिहान शुरू हुआ था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;महानायकों से अब उसकी तुलना हो रही थी। पर सचिन ने कभी किसी को अपने से बौना बताने की चेष्टा नहीं की।लोग ही उन्हें अपने जैसा बताते रहे। पर पेड़ में जितने फल लगते रहे , पेड़ उतना ही झुकता रहा। डॉन और रिचर्ड्स से भी अगर टेस्ट और वन डे एक साथ खेलने को कहा जाता तो शायद उनके भी हाथ पैर कांप जाते। ये बात खुद डॉन भी जानते थे और रिचर्ड्स भी। ये बात हम सब भी जानते हैं, बस सोचते नहीं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;भारतीय क्रिकेट हमेशा की तरह सचिन पर निर्भर थी, सचिन आउट तो खेल खल्लास।भारतीय टीम रोम की  सेना की  तरह थी, सेनापति के गिरते ही मैदान छोड़ कर भाग खड़ी होने वाली भारतीय टीम।सचिन जीत रहे थे पर टीम हार रही थी।अक्रिकेटिक तत्वों ने अब सचिन को कटघरे में लाना चाहा। कहा कि सचिन पैसे के लिए खेलता है, कहा कि सचिन खुद के लिए खेलता है। ये जलनखोरी की हद नहीं थी,अभी तो बहुत कुछ सुनना बाक़ी था। कुछ लोगों को उसका सितारा बनना खलता रहा। वो कहते रहे कि सचिन कमाई कर रहे हैं उन्हें खेल पर ध्यान देना चाहिए। एक मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का अपनी प्रतिभा से कमा रहा था और ये बात लोगों के गले नहीं उतर रही थी। जब वो आउट होता तो कहते कि पैसा हो गया है अब क्यों खेलेंगे, जब वो रन बटोरता तो कहते कि सामने वाली टीम को पैसा खिलाया होगा। आलोचना हास्यास्पद होने लगी थी।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मुश्किल दौर तो तब शुरू हुआ जब सचिन को गेंदबाजों से नहीं, बल्कि चोटों के कारण मैदान से बाहर रहना पड़ा। गेंदबाजों को सपने में आने वाले सचिन अचानक नौसिखिया की तरह खेलने लगे। आलोचक तो कब से सचिन के मुँह मे गंगाजल डालने की ताक में बैठे थे। उन्होने मौक़े को हाथोहाथ लिया और एकबारगी तो सचिन को पूजने वालों को भी उसके अन्तिम समय का एहसास करा दिया। हमसे भी सचिन की बेचारगी नहीं देखी जा रही थी। जब सचिन क्लीन बोल्ड होकर घुटनों पर गिरे तो शायद लाखों करोडो आँखें, हमारी ही तरह छलछला आयी होंगी।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;आज सचिन ने फिर अपने खेल से सबके चेहरे पर पुरानी मुस्कान ला दी है। उसने फिर से विश्वास जगाया है। सचिन को अनाधिकारिक तौर पर ही सही, अपना वारिस घोषित करने वाले डॉन भी आज जिंदा होते तो शायद वो भी ख़ुशी के मारे रो पड़ते। सचिन अनोखा है,वो सबसे हटकर है।आग उगलती गेंदों के बीच भी शांत है, फिरकी के सामने भी धैर्य का पुतला है, गलत निर्णयों के बावजूद भी कभी निराश नहीं होता।सचिन लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों की प्रेरणा है। वो सबसे बड़ा Entertainer है। सचिन कोई महाराजा नहीं है,ना ही वो कोई युवराज है। सचिन उन सब से ऊपर है, वो हममे से एक है। एक साधारण शिक्षक का बेटा सचिन आज क्रिकेट का भगवान है। जो एक ही सीरीज़ में लगातार दो बार डेढ़ सैन्कडे जमाकर दुनिया को विश्वास दिला रहा है कि दैत्यों की सेना "अपराजेय" नहीं है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;क्या नज़ारा है ! सचिन ने पविलियन और दर्शकों का अभिवादन किया है। पोंटिंग सिर खुजा रहे हैं, ली पस्त है। साइमंड्स,हौग और क्लार्क मुँह छुपा रहे हैं कि कहीं बोलिंग के लिए उन्हें न बुला लिया जाये। हेडेन और गिलक्रिस्ट सोच में मग्न हैं। stadium में तिरंगा और ऊंचा लहरा रहा है, वेस्टइंडीज में रिचर्ड्स, कमेंट्री बॉक्स में गावस्कर और एडिलेड में सर डॉन की आत्मा जैसे उत्साह से चीख कर कह रहे हों : &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;"सचिन आला रे"&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-942757353071871948?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/942757353071871948/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=942757353071871948' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/942757353071871948'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/942757353071871948'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/01/blog-post_25.html' title='सचिन आला रे !'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R5m7zgnnb6I/AAAAAAAAADw/NM9EkCcO8Dg/s72-c/sm.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-2329903376813242191</id><published>2008-01-23T06:02:00.000-08:00</published><updated>2008-01-23T07:46:20.312-08:00</updated><title type='text'>एक मोहल्ले की कहानी</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;१४-१५ साल पहले ईंटों का जो जमावड़ा लगा था, वो आदमकद "बाउंड्रीवाल" बन चुका है। कंक्रीट के जंगलों ने जो  मैदान खा लिए थे ,अब बहुमंजिला की छत पर कभी कभी दिखाई देते हैं। बाउंड्री है,ताकि पडोसी घर की कलह देख न सकें, ताकि बच्चों के प्रतिशत कम न हों, ताकि नयी गाड़ी पर नज़र न लगे,ताकि बाहर खेलते बच्चों की गेंद घर में न घुस सके। कहीं घर से ऊंची बाउंड्री है, कहीं बाउंड्री में ही घर है। बाउंड्री और गेट से हैसियत का अंदाजा लगाया जाने लगा है, इतनी ऊँचाई रखी जाती है ताकि आने वाले को ओछेपन का एहसास कराया जा सके और मन मे खौफ पैदा हो । दीवारों से मन नहीं भरा तो ऊपर नुकीले भाले लगा दिए।भीतर का आदमी कूपमंडूकता मे गर्व महसूस करने लगा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;खेलने कूदने की जगह तो पहले ही खप गयी थी, गिरने पड़ने की जगह भी छिन गयी,बचपन बिना चोटों के गुजरता है,घर आने पर मार भी नहीं पड़ती। रंग बिरंगी बैंडेज खरीदने का इकलौता बहाना भी छिन गया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अंग्रेजी मे जैसे सारे बच्चों को बिना किसी भेदभाव के चाइल्ड कहते हैं, पहले मोहल्ले के बच्चे भी चाइल्ड ही होते थे। लड़के लड़की साथ मिलकर गेंद-पिट्टू ,लुका-छिपी, भौंरा-लट्टू  खेलते थे, थोडा बडे होने पर अन्ताक्षरी के दौर चलते थे। अब बच्चे बडे ही पैदा होने लगे हैं, माँ बाप लड़कियों को बाहर नहीं खेलने देते,कहते हैं ज़माना खराब है। किसी का भरोसा नहीं रह गया है।मोहल्ले का चाइल्ड अब बाबा और बेबी बन गया है।कागज़ के जहाज अब पुरानी बात हो गए हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मोहल्ला अब खेलता नहीं, मोहल्ला जड़ हो गया है। कभी कभी छत से नीचे झाँक कर दौड़ते बच्चों को देखता है, मन करता है , पर ट्यूशन का समय हो गया है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;टी वी कहानी घर घर की हो गया है, दादियाँ 200 साल की हो गयी हैं, आदर्श बहुएँ औसतन ५ पति बदल रही हैं ।  आदर्श शब्द के मापदंड बदल चुके हैं।  "एक चिडिया अनेक चिडिया, दाना चुगने बैठी थी" जैसे गाने नहीं सुनाई देते,किले का रहस्य अब किसी को नहीं जानना।  करमचंद और किटी गुज़रे जमाने कि बात हो गए हैं क्योंकि शायद वे पूरे कपडे पहनते हैं। राधा शायद काफ़ी शॉप मे मोगली का इंतज़ार कर रही है। "मिले सुर मेरा तुम्हारा" की जगह वंदे मातरम् के नए रीमिक्स आये हैं। मालगुडी के लेखक कब के मर गए।  मोहल्ला अब रविवार को चित्रहार और महाभारत देखने के लिए नहीं दौड़ता, मोहल्ला अब खुद टी वी वाला हो गया है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मोहल्ला अब बड़ा हो गया है।  भद्र लोगों ने इसका नाम सोसाईटी रखा है। ये अब भी शाम की चाय एक साथ पीता है, पर तब ,जब सोसाइटी का गटर चोक हो जाता है या बिल्डिंग मे नए लोग आने से कार पार्किंग मे दिक्कत आने लगती है।मोहल्ला अब समस्याओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो गया है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt; यह पहले की तरह ठहाके लगाकर नहीं हँसता, ये हलके से मुस्कुराता है. मोहल्ला भद्र हो चला है,चोरों से डरता है और चौकीदार पर बेवजह चिल्लाता है ।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;रिश्ते बदल गए हैं ,पडोसी अब अंकल आंटी हो गए हैं। उनकी बेटियाँ अब राखी नहीं बांधती हैं।नमस्ते नहीं होती है, बस गर्दनें हिलाई जाती हैं । सिवैयों और बताशों के मोहल्ले अलग अलग हो गए हैं, मोहल्ले शक्की हो गए हैं, साम्प्रदायिक हो गए हैं।अब पडोसी के यहाँ की शादी मे कोई हाथ नहीं बंटाता है,मौत पर शोक नहीं मनाता है,शायद मोहल्ले की संवेदनशीलता को लकवा मार गया है ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मोहल्ला अब  मर चुका है, बल्कि उसकी तो तेरहवीं भी खाई जा चुकी है।  ये कौन सी बरसी है याद भी नहीं,किसी ने भी मोहल्ले की कभी खबर तक नहीं ली, हमने बहुत देर कर दी। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-2329903376813242191?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/2329903376813242191/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=2329903376813242191' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/2329903376813242191'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/2329903376813242191'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/01/blog-post_23.html' title='एक मोहल्ले की कहानी'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-2274437459207464444</id><published>2008-01-22T08:49:00.000-08:00</published><updated>2008-01-23T08:26:14.372-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>ये मेरा शहर है ! ये मेरी संस्कारधानी है !</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;लुभावने वादों का शहर,&lt;br /&gt;नेताओं के नारों का शहर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;बडे कारखानों से घिरा,&lt;br /&gt;बड़ा बेरोजगारों का शहर। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;निगम की फाइलों में&lt;br /&gt;कितना विकसित है शहर&lt;br /&gt;छावनी से घिरा हुआ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;फिर भी असुरक्षित है शहर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महिला मेयर के मुँह पर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;स्याही उछालता शहर&lt;br /&gt;शोहदों की भीड़ में &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;चुनरी संभालता शहर ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युवाओं की गालियों से&lt;br /&gt;मुँह छुपाता शहर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;गन्दी नालियों से&lt;br /&gt;बजबजाता शहर &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;केबल न्यूज़ की  होड़ में &lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;संस्कारधानी कहलाता शहर। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;गड्ढों से जूझता शहर,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सड़कें ढूँढता शहर&lt;br /&gt;नर्मदा के गंदे घाटों पर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सिरों को मून्डता शहर ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रतिनिधियों की उपेक्षाओं को &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मूक सहता जाता शहर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;नर्मदा में बहते अस्थिकुम्भ की तरह&lt;br /&gt;देखो बहता जाता शहर। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सपने में भी जाओगे सिहर&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;देख लोगे गर मेरा शहर । ।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;-शिशिर उइके &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-2274437459207464444?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/2274437459207464444/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=2274437459207464444' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/2274437459207464444'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/2274437459207464444'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/01/blog-post_22.html' title='ये मेरा शहर है ! ये मेरी संस्कारधानी है !'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-1775476597568995821</id><published>2008-01-22T00:27:00.000-08:00</published><updated>2008-01-23T07:50:49.603-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्म समीक्षा'/><title type='text'>300 -  कहानी अतीत की, सिनेमा भविष्य का</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R5Xemf_WrGI/AAAAAAAAAC8/vtrCUYN9vrg/s1600-h/VM__SY400_SX600_.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R5Wusv_WrFI/AAAAAAAAAC0/Qw8MKJhTAOY/s1600-h/300_widescreen_wallpaper_3.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5158221032042441810" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R5Wusv_WrFI/AAAAAAAAAC0/Qw8MKJhTAOY/s320/300_widescreen_wallpaper_3.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जैक स्नाईडर की कृति "३००"विश्व सिनेमा उद्योग के द्वार पर भविष्य के सिनेमा की दस्तक है। यह कंप्यूटर ग्राफिक्स और सिनेमा का जबरदस्त फ्यूजन है। यह लोर्ड ऑफ़ द रिंग्स, क्राउचिंग टाइगर हिडेन ड्रैगन,नारनिया या हैरी पॉटर के तरह की फंतासी फिल्मों से एक कदम आगे की कृति है। &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;निर्देशक पूरी फिल्म में दर्शको को सीट से जोड़कर रख पाने में कामयाब हुए हैं। पटकथा इतनी मजबूत है कि आलोचना के लिए आलोचक का पूर्वाग्रह से ग्रसित होना बहुत ही आवश्यक है।&lt;br /&gt;खेद की बात यह है कि कुछ लोगों ने इस फिल्म के संवादों के दोहरे मतलब निकलकर इसे बदनाम करने की कोशिश की है। इसे क्रुसेड बनाम जिहाद का जामा भी पहनाये जाने का असफल प्रयास किया गया है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सच तो ये है कि ये फिल्म एक ऐसी युद्ध किवदंती पर आधारित है, जो कि उस समय से ताल्लुक रखती है जबकि न तो यूनान में ईसाईयत की पहुंच थी,और न ही तब फारस के लोग मुसलमान हुआ करते थे। सच तो ये है कि ऐसी किवदंतियां हर कालखंड में, हर क्षेत्र में प्रेरक कहानियों की तरह सुनाई जाती रही हैं। सच तो ये है कि ये कहानी है एक बडे साम्राज्यवादी सेना के विरुद्ध एक छोटे से राष्ट्र के प्रतिरोध की। कहानी 480 B.C. में हुए ऐतिहासिक थर्मोपाय्ल के युद्ध के इर्दगिर्द घूमती है। स्पार्टा के सम्राट लीओनायिड्स के ३०० फलान्क्स, अपने शौर्य से किस तरह फारस के सम्राट जेर्क्जिस की असीमित सेना को एक संकरे दर्रे में १० दिन तक रोक कर रखने में सफल होते हैं,इसे इस फिल्म में बखूबी फिल्माया गया है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;ग्राफिक्स के बाद फिल्म का सबसे खास आकर्षण है इसके संवाद। इस फिल्म के संवाद दर्शक को सोचने पर मजबूर करते हैं, और थिएटर में बैठे लोगों में जोश भर देते हैं, यहाँ तक कि दर्शक अपनी राष्ट्रीयता भूलकर खुद को स्पार्टा का नागरिक समझने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युद्ध के दृश्यों में बहुत मेहनत की गयी है, खून के फव्वारे आपको रोम के कोलोसेम में बैठकर gladiator युद्ध के रोमांच का अनुभव कराने में सक्षम है.&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;राजा&lt;/span&gt; लिओनाइद्स् के रूप में जेरार्ड बटलर थोड़े थोड़े अंतराल में जोश भरते रहते हैं. बटलर,History channel के लिए हूणों के सरदार अटीला का किरदार पहले भी निभा चुके हैं, उनका व्यक्तित्व,आवाज और डील-डौल योद्धाओं के किरदार निभाने के लिए बिलकुल उपयुक्त है। फारसियों के तीरों की, आकाश को ढँक लेने वाली बौछार पर हँसना हो या ढाल से धुआंधार बारिश को रोकने का शांत दृश्य हो,या अपने सैनिकों से आगे रहकर उनकी रक्षा करना, जेरार्ड ने राजा की भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है। रानी गौर्जो के रूप में लीना हैडी प्रभाव छोड़ने में कामयाब रही हैं, साथ ही कप्तान के किरदार में विंसेंट रीगन ने जेरार्ड बटलर का अच्छा साथ निभाया है।खलनायक के किरदार में रोद्रिगो सान्तोरो मसखरे से लगते हैं, उनकी खलनायकी डरावनी कम रहस्यमयी ज्यादा लगती है। सम्राट जेर्क्जिस जैसी हस्ती के पात्र के लिए रोद्रिगो बिलकुल गलत चुनाव साबित हुए हैं.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;इस कहानी के कुछ अंश काल्पनिक है या सच, इस बात पर भी बहस हो सकती है। पर एक बात झुठ्लाई नहीं जा सकती कि हर युग में इतिहास के साथ साथ कल्पना का मिश्रण किया गया है।इसलिए इस स्तर पर तो हमाम में सब ही नंगे हैं।इसलिए होमर के ट्रॉय और वेदव्यास के महाभारत की तरह ही इसे एक सच की तरह स्वीकारना समय की ज़रूरत है।मेरा सुझाव है कि मुर्दे उखाड़ने की जगह फिल्म देखें और इस भविष्य के सिनेमा का आनंद लें। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-1775476597568995821?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/1775476597568995821/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=1775476597568995821' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/1775476597568995821'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/1775476597568995821'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/01/300.html' title='300 -  कहानी अतीत की, सिनेमा भविष्य का'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/R5Wusv_WrFI/AAAAAAAAAC0/Qw8MKJhTAOY/s72-c/300_widescreen_wallpaper_3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-1605599732762243790</id><published>2008-01-20T01:41:00.000-08:00</published><updated>2008-01-23T07:53:40.054-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>मौन क्या है?</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मौन क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रणय या अपराध की ,&lt;br /&gt;स्वीकारोक्ति है मौन ,&lt;br /&gt;कभी वाणी से भी मुखर&lt;br /&gt;व्यंग्योक्ति है मौन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञानियों के बीच फंसे&lt;br /&gt;अज्ञानी का आभूषण है मौन&lt;br /&gt;रावण के दरबार में विभीषण है मौन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विपदा के समय, गद्दार है ये&lt;br /&gt;खेल भावना में नायक है मौन&lt;br /&gt;उथला पानी कितना चंचल&lt;br /&gt;गहराई का परिचायक है मौन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फंतासी कथा जैसा रुचिकर&lt;br /&gt;एक असीमित सा अध्याय है मौन&lt;br /&gt;वैचारिक कंगाली से उपजा शून्य है, कभी&lt;br /&gt;ज्ञानी के धैर्य का पर्याय है मौन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है निन्द्रा के समान कभी,&lt;br /&gt;जो ज्ञान को ताजा करदे&lt;br /&gt;है मृत्यु के समान कभी&lt;br /&gt;अपनों में उदासी भरदे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे उत्तम भाषण है मौन&lt;br /&gt;आत्मावलोकन का साधन है मौन।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;-शिशिर उइके&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-1605599732762243790?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/1605599732762243790/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=1605599732762243790' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/1605599732762243790'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/1605599732762243790'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/01/blog-post_20.html' title='मौन क्या है?'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-6605307482614336070</id><published>2008-01-18T09:53:00.000-08:00</published><updated>2008-01-20T03:01:37.779-08:00</updated><title type='text'>यहाँ कौन है तेरा, मुसाफिर जाएगा कहाँ?</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;एक हादसे का चश्मदीद बन कर चला आ रहा हूँ, एक बडे घर के होनहार बालक ने अपनी तेज बाईक के दंभ मे एक गरीब रिक्शे वाले को लहुलुहान कर दिया। मेरे शहर मे तेज रफ़्तार गाड़ियों से होने वाले हादसे आम बात हैं, यूं कहिये कि ये हमारी संस्कृति का एक अटूट हिस्सा बन गया है। हमने बिना हाथ दिए मुड जाने वाली स्कूटियों के कारण बाईकों को पिटते देखा है, पर आज जो हुआ वो अपने आप मे खास था। जो जनता किसी ब्रेड चुराने वाले पर कहर बन कर टूटती है वही आज सहिष्णुता की मिसाल बन गयी। बाईक चालक को "सिर्फ" समझायिश दी गयी। शायद ये इसलिए, क्योंकि जो गिरा, जिसे चोट आयी वो उस तबके का था जिसकी प्रतिरोधक क्षमता ख़त्म हो चुकी है। बाईक चालक की हैसियत ने भीड़ के मुँह पर ताला जड़ दिया था और हाथ पैरों में बेडिया डाल दी थी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;ये घटना देखकर मुझे गुवाहाटी (असम) में हुई उस घटना कि याद बरबस ही हो आयी ,जिसमें आरक्षण मांगने जा रहे आदिवासियों को बर्बरता से पीटा गया। १४-१५ साल के बच्चों को "सवर्णों" की भीड़ ने निर्दयता से इतना मारा कि "सरकारी आंकडों" को भी ३ मौतें दर्ज करनी पड़ी। उनका कुसूर सिर्फ इतना था कि वे उस राज्य में आरक्षण मांगने निकले थे जहाँ वे पुश्तों से मजदूरी कर जीवनयापन कर रहे थे। भीड़ ने सब पर हाथ साफ किया, जिसे मौका मिला उसने अपनी ही तरह से, हाथ मे आये आदिवासियों की जोरदार पिटाई की। एक आदिवासी लड़की को पुलिस ने भीड़ के हाथों सौंप दिया ताकि दुशासनों की अधूरी तमन्नाएँ पूरी हो सकें।&lt;br /&gt;हालांकि आदिवासी छात्रों को शिक्षा और नौकरी में आरक्षण तो नहीं मिला और न्याय की उम्मीद भी नहीं के बराबर है. हाँ, ये ज़रूर है कि नक्सलवादियों को नयी पौध तैयार करने मे अब ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे "दलित की बेटी" ने भी मुख्यमन्त्री पद का भार संभालने के बाद दलितों को मुस्कुराने के कोई अवसर प्रदान नहीं किये हैं। सुना है कि मायावती सरकार ने "दलित अत्याचार अधिनियम" में संशोधन की पूरी तैयारी कर ली है। जिसके अनुसार अब हत्या और बलात्कार के अलावा बाक़ी सभी अपराधों को इस अधिनियम के दायरे से बाहर रखा जाएगा, यानी कि जातिसूचक शब्दों का प्रयोग खुलेआम होगा और पढे लिखे दलितों को नीचा दिखाने के लिए उनके पारिवारिक व्यवसाय के नाम से उन्हें संबोधित करना अब और भी आसान हो जाएगा। उत्तरप्रदेश सरकार के अनुसार इस कानून का दुरूपयोग रोकने के लिए ऐसा किया जा रहा है। मुझे तो अब महिलाओं की भी चिंता हो रही है, कहीं दहेज़ विरोधी,तलाक सम्बन्धी और बलात्कार के कानूनों को भी तथाकथित "दुरुपयोगों" के कारण ख़त्म न कर दिया जाए। हालांकि इसके खिलाफ कुछ पढे-लिखे दलितों ने लामबंदी की है और याचिका भी दायर की है,यह शिक्षित समाज ही कुछ उम्मीदें जगाता है।&lt;br /&gt;वैसे इसमें "दलित की बेटी" का दोष नहीं है, जब से उन्होने "सामाजिक-यांत्रिकी" के बल पर चुनाव जीता है, वे "समाज " की दत्तक पुत्री हो गयी हैं और उन्होने यह जान लिया है कि लोकतंत्र में "पैदा करने वाले से" ज्यादा अधिकार "पालने वाले" का होता है। वे तो सिर्फ पालकों के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने के लिए ऐसा कर रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे दोष तो रेनुका चौधरी का भी नहीं है, वे भी मुम्बई में नववर्ष के उपलक्ष्य में हुए कुकृत्य कि जांच के लिए उत्सुक हैं।परन्तु शायद उनतक भी गुवाहाटी की आदिवासी छात्रा की चीख नहीं पहुँच सकी, क्योंकि "मीडिया" भी शायद उस चीरहरण का वीडियो mute करके देख रहा था। अब तो लगता है कि पशु-अधिकार के लिए जूझने वाले संगठन , मानवाधिकार वाले संगठनों की बनिस्बत ज्यादा कुशलता और ईमानदारी से काम करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-6605307482614336070?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/6605307482614336070/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=6605307482614336070' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/6605307482614336070'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/6605307482614336070'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shishirwoike.blogspot.com/2008/01/blog-post_9369.html' title='यहाँ कौन है तेरा, मुसाफिर जाएगा कहाँ?'/><author><name>वनमानुष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01355881041669667464</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='19' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_2yGNDr1Ecmw/TO5z7a27lqI/AAAAAAAAAHw/BqTUd6C1QoI/S220/dabng.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6601110236470072152.post-8162874320284721159</id><published>2008-01-15T07:47:00.000-08:00</published><updated>2008-01-20T03:00:19.647-08:00</updated><title type='text'>जन्मदिन</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;१४ जनवरी १९८५, ये दिन मेरे परिवार के लिए बहुत ही खास था। वैसे मेरा जन्मदिन बहुत से लोगो के लिए खास होता है। कल मेरा २३ वां जन्मदिन था, मैं इसे सादगी के साथ मनाना चाहता था क्योंकि अब मैं एक बच्चा नहीं रहा , बड़ा और बेरोजगार हो चुका हूँ। पर मेरे पिछले २२ जन्मदिनों ने शायद "पार्टी" के कुछ ऐसे मानदंड स्थापित कर दिए हैं जिन्हें अब सादगी की ओर मोड़ पाना अब संभव नहीं दिखता। मेरा जन्मदिन,वह भी बिना किसी treat या party के अब तो कतई संभव नहीं है, यह बहुत लोगों की उम्मीदों पर पानी फेरने जैसा होगा।हालांकि कल मैंने अपना २३ वा जन्मदिन साधारण रखने की पुरजोर कोशिश जरूर की है, और मैं इसमे शायद कुछ हद तक सफल भी रहा हूँ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;वैसे मेरे जन्मदिन पर मायावती के जन्मदिन की तरह कोई भव्य राज्यव्यापी रैली तो नहीं निकलती, ना ही सोनिया गाँधी के जन्मदिन की तरह घर के बाहर टिकट मांगने वालो की भीड़ लगती है। मेरा हर जन्मदिन दोस्तो और परिवार के साथ ही बीतता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जन्मदिवस के साथ साथ बहुत सारी भ्रान्तियाँ भी जुडी होती हैं, कल ही कोई मुझसे कह रह था की जनवरी में प्रसिद्ध और शक्तिशाली लोग जन्म लेते हैं,वैसे एक बात बता दूँ कि  प्रसिद्ध और कुख्यात मे अंतर बहुत कम लोगो को पता होता है, साथ ही शक्ति के भी कई मायने होते हैं . मेरे उस मित्र ने फिर मुझे जनवरी मे जन्म लेने वाले प्रसिद्ध हस्तियों के नाम गिनाकर मुझे convince करने का प्रयास किया। मैंने उसकी बातो से प्रभावित होकर जब इंटरनेट पर खोजबीन की तो सद्दाम हुस्सैन, मुहम्मद अली, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस,एल्विस प्रेस्ली,लुईस ब्रेल,जोन ऑफ़ आर्क, जोए फ्रेजिअर,मार्टिन लूथर किंग जूनियर,बेंजामिन फ्रैंकलिन,फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट, जिम कैरी जैसे नाम जनवरी की पैदाईश सूची मे पाए। ये खोज मुझे उत्साहित कर रही थी और इतने सारी प्रसिद्ध हस्तियों का नाम मेरे जन्म माह मे पाकर मेरा मन कपडे उतार कर &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;Eureka Eureka&lt;/span&gt; चिल्लाने और सडको पर दौड़ने का हो पाता उससे पहले ही मेरे चेतन मन ने मुझे अन्य माहों मे पैदा हुए लोगों के नाम ढूँढने के लिए कहा, फिर मैंने पाया अलग हर माह में प्रसिद्ध हस्तियों ने उसी तादाद में जन्म लिया है जितना कि जनवरी में। इस बात के दो अर्थ निकाले जा सकते हैं कि या तो मैं खास इंसान नहीं हूँ और जनवरी मे पैदा हुए अनेको गुमनाम लोगों कि तरह इस भीड़ का हिस्सा बन जाऊंगा,या फिर ये कि हर वह व्यक्ति जो इस धरती पर जन्म लेता है वह खास होता है बस ज़रूरत होती है कि वह अपनी क्षमताओं और कमियों को पहचाने,अपने लक्ष्य निर्धारित करे और उन्हें पाने के प्रयास जारी रखे,ताकि वो औरों कि तरह गुमनाम न हो जाये। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जन्मदिवस का राशियों के साथ भी महत्वपूर्ण संबंध है और राशियों का भविष्य से ,ऐसा कुछ लोग मानते हैं (या कहें कि बहुत से लोग मानते हैं)। पर जहाँ तक मैंने २३ साल कि उम्र तक जो भी observe किया है ,यह पाया है कि भिन्न भिन्न लोगों के राशिफल प्रायः प्रायः एक समान ही होते हैं और उनमे थोडा बहुत फेर बदल करके लोगों के सामने प्रस्तुत किया जाता है ताकि हज़ारों लोगों को सपने बेचे जाएँ और चंद लोगों कि कमाई का ज़रिया सदैव बना रहे। वैसे राशी, रत्नों, कुंडलियों, &lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;तावीजों,&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;झाड़ फूँक इत्यादी का ये खेल बहुत पुराना है और मनुष्य के अंधविश्वास की कोई सीमा न होने के कारण ये खेल अभी लम्बा चलेगा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;वैसे ऐसे भी लोग हैं जो जन्मदिन मनाना गलत मानते हैं, उनके अनुसार आप " उस दिन"को उत्सव की तरह मन रहे हो जो आपको धीरे धीरे मौत की तरफ ले जा रहा है, अब मुझे नहीं पता की आप इसे क्या कहेंगे पर मैं तो इसे pessimism की पराकाष्ठा कहूँगा। कुछ रूढिवादी मानसिकता के लोग जन्मदिन मनाने को भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी हमले की तरह देखते हैं, इसे क्या संज्ञा दी जाए? शायद इसे मानसिक दिवालियापन कहना ही ठीक होगा। केक काटते हुए या मोमबत्तियां फूंकते हुए बच्चे को न तो पश्चिमी सभ्यता के आक्रमण भय होता है और ना ही मौत की तरफ बढ़ने का। उसके मन में जो हर्षोल्लास की अनुभूति होती है उसके सामने ये सारी बातें नगण्य और ओछी हो जाती हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;हाँ, जन्मदिवस को मनाने के तरीको पर ज़रूर बहस की जा सकती है, वैसे एक स्वतंत्र देश में सबको छूट है की वे जैसे चाहें अपना जन्मदिवस मन सकते हैं, बस आप जो भी करे वो आपको ख़ुशी दे और किसी को नुकसान न पहुचाए.&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;ये पृष्ठ यहीं समाप्त करता हूँ इसी उम्मीद के साथ कि आप और मैं भले ही जन्मदिन को कैसे भी celebrate करें,करें या न करें, कम से कम अपनेअपने जन्म के महत्व को ज़रूर समझें.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6601110236470072152-8162874320284721159?l=shishirwoike.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shishirwoike.blogspot.com/feeds/8162874320284721159/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6601110236470072152&amp;postID=8162874320284721159' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6601110236470072152/posts/default/8162874320284721159'/><link rel='self' 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